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हर वारदात के बाद जांच का दिखावा…मुंबई लोकल यात्रियों की सुरक्षा फिर रामभरोसे!

सामना संवाददाता / मुंबई

चर्चगेट–नालासोपारा लोकल में मयंक लोहार की चाकू मारकर हत्या के बाद जीआरपी ने यात्रियों के बैग की आकस्मिक जांच बढ़ाने की घोषणा की है। लेकिन मुंबईकरों के लिए ऐसी घोषणाएं नई नहीं हैं। हर हत्या, विस्फोट या बड़ी वारदात के बाद कुछ दिनों तक तलाशी अभियान चलता है, पुलिस की मौजूदगी बढ़ती है और फिर व्यवस्था धीरे-धीरे पुराने ढर्रे पर लौट आती है।
जांच में सामने आया कि मयंक हत्याकांड का आरोपी कथित रूप से करीब दो महीने तक बैग में चाकू रखकर लोकल ट्रेनों में यात्रा करता रहा। इसके बावजूद वह कभी सुरक्षा जांच में नहीं पकड़ा गया। यह तथ्य मैनुअल बैग जांच की नई घोषणा से अधिक मौजूदा व्यवस्था की विफलता उजागर करता है। मुंबई उपनगरीय रेलवे आतंकियों के निशाने पर भी रही है। ११ जुलाई २००६ को पश्चिम रेलवे की लोकल ट्रेनों में मात्र ११ मिनट के भीतर सात बम विस्फोट हुए थे, जिनमें २०० से अधिक लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए। इसके बाद सीसीटीवी वैâमरे, मेटल डिटेक्टर, बैगेज स्वैâनर, बम निरोधक दस्ते और त्वरित प्रतिक्रिया दल तैनात करने के बड़े दावे किए गए। आज रेलवे हजारों वैâमरे और सुरक्षा उपकरण लगाने की बात करता है, लेकिन यात्रियों का अनुभव बताता है कि अनेक प्रवेश द्वार बिना प्रभावी जांच के खुले रहते हैं।
मुंबई लोकल नेटवर्क की संरचना जटिल है। अधिकांश स्टेशनों पर कई अनियंत्रित प्रवेश मार्ग हैं और प्रतिदिन लाखों यात्रियों की जांच हवाई अड्डे की तरह करना व्यावहारिक रूप से कठिन है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा केवल कागजों पर छोड़ दी जाए। संवेदनशील स्टेशनों पर कार्यशील बैग स्वैâनर, प्रत्येक प्रवेश मार्ग पर मेटल डिटेक्टर, प्रशिक्षित कर्मी, आकस्मिक जांच और सीसीटीवी की वास्तविक समय में निगरानी की जा सकती है।
सरकार बुलेट ट्रेन और विश्वस्तरीय स्टेशनों का प्रचार करती है, लेकिन सामान्य मुंबईकर की जीवनरेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेन में सुरक्षित यात्रा अब भी सुनिश्चित नहीं है। वारदात के बाद सैकड़ों कैमरों की रिकॉर्डिंग खंगालकर आरोपी पकड़ना पुलिस की सफलता हो सकती है, मगर अपराध को होने से पहले रोकना ही वास्तविक सुरक्षा है।

-जवाबदेही तय हो
जीआरपी और रेलवे को स्पष्ट करना चाहिए कि बैग जांच कितने समय चलेगी, प्रतिदिन कितनी जांच होगी और बंद पड़े स्कैनर व मेटल डिटेक्टर कब चालू होंगे। हर घटना के बाद कुछ दिनों की सख्ती नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी और जवाबदेह सुरक्षा व्यवस्था ही समाधान है।

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