कविता श्रीवास्तव
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी दलों का दिल्ली में विरोध प्रदर्शन जारी है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट को सार्वजनिक परिवहन, नागरिकों की आवाजाही, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हिरासत और पत्रकारों के कामकाज से जुड़े मामलों में निर्देश देना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी व्यवस्था पर सवाल उठाए। इसके बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे तरीके से एकत्र लोगों को गैरकानूनी रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने लोगों की आवाजाही सामान्य बनाने, बैरिकेडिंग की समीक्षा करने, इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रखने तथा वकीलों और पत्रकारों को अपना काम करने देने के निर्देश भी दिए। विरोध प्रदर्शन केवल राजनीतिक दलों का आंदोलन का नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, जिसमें असहमति के लिए जगह होनी चाहिए। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने अधिकार देता है। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को रोकने, गिरफ्तारियां करने, मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने और पत्रकारों के काम में कथित बाधा डालने की घटनाओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के संतुलन पर सवाल खड़े किए हैं। क्या कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों की आवाजाही और शांतिपूर्ण विरोध को व्यापक स्तर पर बाधित करना जरूरी है? क्या सुरक्षा व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती, जिसमें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए कानून-व्यवस्था भी कायम रखी जाए? सुप्रीम कोर्ट के निर्देश इसी बात की याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। विपक्ष ने चुनाव आयोग के कामकाज या मतदाता सूची से जुड़े कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए हैं, तो उनका जवाब दिया जाना चाहिए। सवाल उठाने वाले को ही खारिज कर देना समस्या का समाधान नहीं है। इसी राजनीतिक खींचतान के बीच देश के असली मुद्दे लगातार पीछे छूट रहे हैं। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर और आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार ऐसे विषय हैं, जिनका सीधा संबंध करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से है। जनता सरकारों को चुनती है, ताकि उसकी समस्याओं का समाधान हो, न कि वह हर दिन राजनीतिक टकराव और विरोध प्रदर्शनों की खबरों में उलझी रहे। यह भी विचारणीय है कि बार-बार अदालत को उन मामलों में हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है, जिनमें सरकार और प्रशासन अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के तहत पहल कर सकते हैं। हर विवाद का समाधान अदालत से ही मिले यह तो सत्ता की विफलता है।
सरकार की असली ताकत समस्याओं का समाधान करने में है। एक मजबूत लोकतंत्र वही है, जहां शांतिपूर्ण विरोध को दुश्मनी नहीं समझा जाता, पत्रकारों को अपना काम करने दिया जाता है और जनता के बुनियादी मुद्दों को राजनीतिक टकराव से ऊपर रखा जाता। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता की आवाज दबाने से सवाल खत्म नहीं होते। उनका समाधान तभी होता है, जब उन्हें सुना जाता है और उन पर ईमानदारी से कार्रवाई की जाती है।
