मुख्यपृष्ठस्तंभकोर्ट-रूम : गिरफ्तारी में जानबूझकर ढील और हिरासत से फरार

कोर्ट-रूम : गिरफ्तारी में जानबूझकर ढील और हिरासत से फरार

एड. कनई बिस्वास

धारा २५९, २६० और २६१
भाग:८७

किसी आरोपी या दोषी व्यक्ति को पकड़ना जिस लोक सेवक का कानूनी कर्तव्य है, वह जानबूझकर उसे नहीं पकड़ता या अपनी लापरवाही से हिरासत में मौजूद व्यक्ति को भागने देता है, तो यह केवल कर्तव्य में चूक नहीं रह जाती। भारतीय न्याय संहिता, २०२३ की धारा २५९, २६० और २६१ ऐसी ही स्थितियों में लोक सेवक की आपराधिक जिम्मेदारी तय करती हैं।
केस स्टडी-१: ‘जानबूझकर गिरफ्तारी नहीं करना’ (धारा २५९)
एक पुलिस अधिकारी को गंभीर अपराध के आरोपी को गिरफ्तार करने की कानूनी जिम्मेदारी दी गई। अधिकारी को आरोपी का ठिकाना भी पता था, लेकिन निजी संबंधों के कारण उसने जानबूझकर गिरफ्तारी नहीं की और आरोपी को भागने का समय मिल गया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी लोक सेवक था? क्या उस पर संबंधित व्यक्ति को पकड़ने का कानूनी दायित्व था? क्या उसने जानबूझकर गिरफ्तारी नहीं की?
पैâसला-यदि साबित हो जाए कि कानूनी रूप से गिरफ्तारी के लिए बाध्य लोक सेवक ने जानबूझकर व्यक्ति को नहीं पकड़ा, तो धारा २५९ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: यहां सामान्य भूल या असफल प्रयास पर्याप्त नहीं है। गिरफ्तारी न करने की जानबूझकर की गई चूक महत्वपूर्ण है।
केस स्टडी-२: ‘सजा पाए व्यक्ति को जानबूझकर नहीं पकड़ना’ (धारा २६०)
एक दोषी को न्यायालय ने कारावास की सजा सुनाई। उसे पकड़कर जेल भेजने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी की थी। अधिकारी को दोषी का ठिकाना मालूम होने के बावजूद उसने मिलीभगत कर गिरफ्तारी नहीं की, जिससे दोषी फरार हो गया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या संबंधित व्यक्ति सजा पा चुका था या कानूनन हिरासत में भेजे जाने का आदेश था? क्या लोक सेवक उसे पकड़ने के लिए कानूनी रूप से बाध्य था? क्या उसने जानबूझकर अपना कर्तव्य नहीं निभाया?
पैâसला-ये तत्व सिद्ध होने पर संबंधित लोक सेवक के विरुद्ध धारा २६० के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
समझें: धारा २५९ और २६० में महत्वपूर्ण अंतर है। धारा २६० विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति से संबंधित है जो सजा के अधीन हो या जिसे कानूनन हिरासत में भेजा गया हो।
केस स्टडी-३: ‘लापरवाही से हिरासत से भागने देना’ (धारा २६१)
एक आरोपी पुलिस हिरासत में था। उसकी निगरानी करने वाले अधिकारी ने गंभीर लापरवाही बरती और सुरक्षा व्यवस्था छोड़कर चला गया। मौका पाकर आरोपी हिरासत से भाग निकला।
अदालत क्या देखेगी?
क्या फरार व्यक्ति लोक सेवक की कानूनी हिरासत में था? क्या उसकी सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी संबंधित लोक सेवक पर थी? क्या उसकी लापरवाही के कारण व्यक्ति भागने में सफल हुआ?
पैâसला-यदि हिरासत से भागना लोक सेवक की लापरवाही का परिणाम साबित होता है, तो धारा २६१ के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
समझें: इस धारा में जानबूझकर भगाना आवश्यक नहीं है। गंभीर लापरवाही के कारण हिरासत में मौजूद व्यक्ति का भाग जाना भी लोक सेवक को आपराधिक जिम्मेदारी के दायरे में ला सकता है।
धारा २५९ से २६१ का संदेश साफ है—गिरफ्तारी और हिरासत केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। जिसे पकड़ना कानूनी कर्तव्य है उसे जानबूझकर छोड़ देना, सजा पाए व्यक्ति की गिरफ्तारी टालना या लापरवाही से किसी को हिरासत से भागने देना कानून की प्रक्रिया को कमजोर करता है। इसलिए ऐसी जानबूझकर चूक और लापरवाही को भी भारतीय न्याय संहिता अपराध मानती है।
(अगले अंक में: धारा २६२, २६३ और २६४–अपनी वैध गिरफ्तारी का विरोध या बाधा, किसी दूसरे व्यक्ति की गिरफ्तारी में बाधा तथा अन्य मामलों में गिरफ्तारी न करने या भागने देने से जुड़े अपराधों को आसान उदाहरणों से समझेंगे।)

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