मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : बेबस क्यों हैं आज नैरेटिव के सरताज

प्रणवाक्षर : बेबस क्यों हैं आज नैरेटिव के सरताज

 प्रणव प्रियदर्शी

समस्या यह नहीं है कि एक नवंबर की तारीख करीब आती जा रही है और कांग्रेस रामलीला मैदान में प्रस्तावित विरोध रैली को स्थगित करने की सोचने तक को तैयार नहीं। समस्या यह भी नहीं कि गिरफ्तारी और मार-कुटाई से लेकर पीस बॉन्ड तक सारे टोटके थोड़ा-बहुत शुरुआती असर दिखाकर नाकाम होते जा रहे हैं, युवा असंतोष को काबू करने का कोई कारगर नुस्खा नहीं मिल रहा।
संवाद का संकट
सबसे बड़ा संकट मौजूदा नेतृत्व के सामने यह है कि आम लोगों, खासकर अपने समर्थकों से प्रभावी संवाद के जितने भी कारगर तरीके इसने विकसित किए थे, वे सब अप्रासंगिक होते दिख रहे हैं। इन नव अर्जित तौर-तरीकों से उपजे कॉन्फिडेंस का ही कमाल था कि मोदी जी की सरकार ने पहले से स्थापित वे सभी टूल नष्ट कर दिए या होने दिए, जिनका इस्तेमाल कर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था अब तक फलती-फूलती रही थी।
पुराने की जगह नया
चाहे बात विपक्ष के साथ सत्तापक्ष के निरंतर संवाद की हो या अहम मसलों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की या फिर प्रधानमंत्री की नियमित अंतराल पर होने वाली प्रेस कॉन्प्रâेंसों की, नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में इन सबका अकाल-सा दिखता रहा है। इनकी जगह मन की बात जैसे रेडियो कार्यक्रम शुरू किए गए, प्रधानमंत्री और तमाम मंत्रियों द्वारा अखबारों में लेख लिखने का चलन बढ़ा और व्हॉट्सऐप के जरिए तमाम झूठी-सच्ची सूचनाएं आम लोगों तक भिजावने की व्यवस्थाएं बनीं।
हंसी के पात्र
ये सब अपनी जगह पर कायम हैं आज भी, उनका इस्तेमाल भी हो रहा है पूरी तत्परता से, लेकिन जो असर इनका दिखता था, वह अब नदारद है। आम लोगों के मन में सांप्रदायिक जहर भरने और हर मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम रूप देकर विभिन्न समुदायों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करने में व्हॉट्सऐप चैनल की अहम भूमिका रही है। आज भी यह चैनल पहले जैसा ही सक्रिय है, लेकिन व्हॉट्सऐप अंकलों का प्रभाव कम हो गया है। अब अपने सर्कल में वे सब हंसी का पात्र बनते जा रहे हैं।
बदल गया माहौल
हालिया आंदोलनों के जरिए समाज में जेन-जी के उभार ने सामाजिक और सार्वजनिक मचों पर ही नहीं, परिवार के अंदर का माहौल भी बदल दिया है। अब ये कथित व्हॉट्सऐप अंकल, पहले जैसी बातें करते हुए या तो खुद ही झेंप जाते हैं या एकाध कमेंट के बाद चुप हो जाते हैं। सो, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि व्हॉट्सऐप चैनल के जरिए जो कच्चा माल उन तक लगातार पहुंचाया जा रहा है, उसका वे करें क्या। पहले वे उसे अपने फैमिली ग्रुप्स में या दोस्तों के बीच आगे बढ़ाकर गौरवांंवित महसूस करते थे, अब शर्मिंदगी या जिल्लत झेलनी पड़ती है।
नैरेटिव चलाना मुश्किल
यही मुश्किल अपना नैरेटिव चलाने में भी हो रही है। पहले विपक्ष द्वारा उठाए गए बड़े से बड़े मुद्दे को राहुल गांधी की कथित ‘पप्पू इमेज’ की भेंट चढ़ा दिया जाता था। किसान आंदोलन तक यह स्थिति रही कि उसे पाकिस्तान प्रेरित या खालिस्तानी साजिश का नतीजा बताने की आंदोलनकारी किसानों पर या उनके समर्थकों पर चाहे जैसी भी प्रतिक्रिया हो, आम देशवासियों के बड़े हिस्से पर उसका असर दिखता था।
जंतर-मंतर का जादू
जंतर-मंतर प्रोटेस्ट पार्ट-वन में ही वह जादू चला, जिसने इस तरह के नैरेटिव को पूरी तरह बेअसर साबित कर दिया। जंतर-मंतर पार्ट टू के दौरान भी सत्तारूढ़ हलकों से वे सारी बातें चलाने की कोशिश हुई, लेकिन आंदोलनकारी युवाओं को तो छोड़िए, देशवासियों के किसी भी हिस्से ने उन बातों को गंभीरता से नहीं लिया।
खुद को खड़ा कैसे करे
ऐसे में मौजूदा नेतृत्व के सामने यह बड़ी चुनौती है कि विपक्षी दलों के लगातार जारी अभियान और आंदोलनकारियों की तेज होती मांग के बरक्स वह खुद को राजनीतिक तौर पर खड़ा कैसे करे। विदेशी साजिश बताना, हिंसा की आशंका जताना, आंदोलनकारियों को बदनाम करना, राहुल गांधी को अपरिपक्व, अगंभीर बताना, ये सारे बार-बार आजमाए जा चुके नुस्खे नाकाम हो चुके हैं। इनके जरिए वह न तो विपक्ष अभियान को खारिज कर पा रहा और न ही उनके द्वारा खड़े किए जा रहे सवालों को टाल पा रहा।
बहस में नाकाम
फिलहाल, तो आलम यह है कि कोई घनघोर बीजेपी समर्थक भी अगर तार्किक बहस में उतरता है तो किसी को यह नहीं कह सकता कि ज्ञानेश कुमार के जरिए इस सरकार ने वोट चोरी का प्रयास नहीं किया या एसआईआर के जरिए करोड़ों लोगों को वोटिंग लिस्ट से बाहर करने का फैसला सही था। अधिक से अधिक वह यही कह पाता है कि क्या अतीत में कांग्रेस की सरकारों के समय गड़बड़ियां नहीं होती थीं। क्या पूरी चुनावी व्यवस्था अब तक दूध की धुली रही है…? ऐसे तर्क सत्तारूढ़ गठबंधन के कार्यकर्ताओं को बहस में कब तक टिका पाएंगे और वे उन्हें सरकार के बचाव में खड़े होने के लिए कब तक मजबूर करेंगे, खुद समझा जा सकता है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

 

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