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फ्रांस-इटली से पुर्तगाल तक महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ उबाल… सड़कों पर जनता

यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, आवास संकट, कम वेतन और सरकारी नीतियों के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनों की वजहें अलग-अलग हैं, लेकिन आर्थिक दबाव और सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष कई जगहों पर प्रमुख मुद्दा रहा। फ्रांस में बड़े पैमाने पर रैलियों के दौरान पुलिस से झड़पें हुर्इं!
फ्रांस: फ्रांस में शनिवार को महंगाई और स्कूलों के लिए कम बजट मिलने के विरोध में देशभर में करीब ४ लाख १० हजार लोगों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुर्इं। गृह मंत्रालय के मुताबिक, राजधानी पेरिस में ही करीब १ लाख १० हजार लोग सड़कों पर उतरे। यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ, जब एक हफ्ते पहले ही फ्रांस के कई शहरों में हिंसा, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं हुई थीं। लगातार हो रहे प्रदर्शनों से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार पर दबाव बढ़ रहा है!
इटली: मिलान और रोम जैसे शहरों में छात्रों और ट्रेड यूनियनों ने महंगाई, शिक्षा बजट और युद्ध विरोधी मुद्दों पर प्रदर्शन किए। हिंसक झड़पों के बाद सरकार ने कड़े सुरक्षा उपाय लागू किए।
पुर्तगाल: राजधानी लिस्बन के रॉसियो स्क्वायर पर आसमान छूते मकानों के किराए और आवास संकट के खिलाफ लोगों ने विरोध दर्ज कराया और तंबू लगाकर प्रदर्शन किया।
स्पेन: स्पेन में आंदोलन का सबसे बड़ा कारण आवास संकट और बढ़ती महंगाई है। सितंबर २०२६ में मैड्रिड में एक ८७ वर्षीय बुजुर्ग महिला (मारिकादमेन अबास्कल) को मकान मालिक द्वारा किराया २३० प्रतिशत बढ़ाए जाने के बाद घर से निकाल दिया गया था, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे देश में गुस्से की आग भड़का दी।
अल्बानिया: अल्बानिया की राजधानी तिराना में चल रहा यह आंदोलन ‘फ्लेमिंगो रेवॉल्यूशन’ के नाम से जाना जा रहा है। इसकी शुरुआत तटीय संरक्षित क्षेत्रों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर बनाए जा रहे लक्जरी रिजॉर्ट प्रोजेक्ट्स और सरकारी भ्रष्टाचार के विरोध से हुई थी। बाद में, इसमें हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र भी शामिल हो गए, जो शिक्षा के गिरते स्तर, भारी बेरोजगारी और आसमान छूती ट्यूशन फीस का विरोध कर रहे हैं।
अन्य देश बेल्जियम और ग्रीस में भी कम मजदूरी, सार्वजनिक सेवाओं में कटौती और आर्थिक दबाव को लेकर व्यापक असंतोष देखा गया है।

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