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पुष्कर-सृष्टि निर्माता ब्रह्मा का धाम

शीतल अवस्थी

राजस्थान के अजमेर जिले में अरावली पर्वतमाला के बीच स्थित पुष्कर भगवान ब्रह्मा की उपासना का प्रमुख तीर्थ है। पवित्र सरोवर, ब्रह्मा मंदिर और अनेक घाट इस प्राचीन नगरी को धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशिष्ट बनाते हैं।
सनातन परंपरा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमशः सृष्टि की रचना, पालन और संहार का अधिष्ठाता माना गया है। भगवान विष्णु और शिव के मंदिर देशभर में पाए जाते हैं, लेकिन ब्रह्माजी की उपासना के प्रमुख मंदिर बहुत कम हैं। राजस्थान का पुष्कर इन्हीं दुर्लभ तीर्थों में सर्वोपरि माना जाता है।
अजमेर से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित पुष्कर तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा है। यहां स्थित पवित्र पुष्कर सरोवर और जगतपिता ब्रह्मा का मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। धार्मिक ग्रंथों में पुष्कर को तीर्थराज अर्थात तीर्थों का राजा कहा गया है।
कमल से प्रकट हुआ पुष्कर
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय वज्रनाभ नामक असुर ने ब्रह्माजी के मानस पुत्रों को परेशान करना आरंभ कर दिया। ब्रह्माजी ने अपने कमल से उसका वध किया। इस दौरान कमल की तीन पंखुड़ियां पृथ्वी पर गिरीं और उन स्थानों पर जलस्रोत प्रकट हुए।
ये स्थान ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर कहलाए। ‘पुष्कर’ शब्द को ‘पुष्प’ और ‘कर’ से जोड़ा जाता है। अर्थात ब्रह्माजी के हाथ से गिरा हुआ कमल। एक अन्य भावार्थ में पुष्कर का अर्थ कमल भी होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ पुष्कर में ब्रह्मा, मध्य पुष्कर में विष्णु और कनिष्ठ पुष्कर में भगवान शिव का निवास माना गया है।
ब्रह्माजी का यज्ञ और सावित्री का श्राप
पुष्कर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा ब्रह्माजी के यज्ञ की है। मान्यता है कि सृष्टि के कल्याण के लिए ब्रह्माजी ने पुष्कर में यज्ञ करने का निश्चय किया। यज्ञ के शुभ मुहूर्त में उनकी पत्नी देवी सावित्री समय पर नहीं पहुंच सकीं। यज्ञ में पत्नी की उपस्थिति आवश्यक होने के कारण ब्रह्माजी ने गायत्री से विवाह करके उनके साथ यज्ञ संपन्न कर दिया।
जब सावित्री वहां पहुंचीं और उन्होंने गायत्री को ब्रह्माजी के साथ बैठा देखा, तो वे क्रोधित हो गईं। उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि पृथ्वी पर उनकी पूजा बहुत कम स्थानों पर होगी। साथ ही उन्होंने पुष्कर को ब्रह्माजी की आराधना का प्रमुख क्षेत्र रहने का विधान दिया।
पुष्कर की एक पहाड़ी पर देवी सावित्री का मंदिर स्थित है, जबकि दूसरी ओर गायत्री देवी की उपासना की जाती है। यह कथा पुष्कर की धार्मिक परंपरा का केंद्रीय आधार मानी जाती है।
जगतपिता ब्रह्मा मंदिर
पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर भारतीय मंदिर परंपरा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। गर्भगृह में भगवान ब्रह्मा की चार मुखों वाली प्रतिमा विराजमान है। उनके चार मुख चार वेदों और चार दिशाओं के प्रतीक माने जाते हैं। उनके साथ देवी गायत्री का स्वरूप भी प्रतिष्ठित है।
ब्रह्माजी के हाथों में वेद, जपमाला, कमंडल और यज्ञ से संबंधित पात्र प्रदर्शित किए जाते हैं। उनका वाहन हंस है, जो विवेक का प्रतीक है। परंपरा में हंस के विषय में कहा जाता है कि उसमें नीर और क्षीर को अलग करने की क्षमता है। इसी प्रकार मनुष्य को सत्य और असत्य तथा उचित और अनुचित में अंतर करने वाला विवेक विकसित करना चाहिए।
वर्तमान मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार के संबंध में अलग-अलग ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं। विभिन्न कालखंडों में इसका पुनर्निर्माण हुआ। इसकी विशिष्ट लाल शिखर-रचना और प्रवेश द्वार श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं।
पुष्कर सरोवर और 52 घाट
पुष्कर सरोवर के चारों ओर अनेक घाट बने हैं। परंपरागत रूप से इनकी संख्या 52 बताई जाती है। ब्रह्म घाट, वराह घाट और गौ घाट इनमें प्रमुख हैं। श्रद्धालु सरोवर में स्नान करके देवताओं और पितरों के निमित्त पूजा, तर्पण तथा दान करते हैं।
मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पुष्कर सरोवर में स्नान और ब्रह्माजी के दर्शन से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। हालांकि स्नान करते समय घाटों के नियमों, जल की स्वच्छता और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
कार्तिक पूर्णिमा का महत्त्व
कार्तिक पूर्णिमा पुष्कर का सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक अवसर है। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ संपन्न किया था। इस अवधि में हजारों श्रद्धालु पवित्र सरोवर में स्नान और ब्रह्मा मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं।
इसी समय प्रसिद्ध पुष्कर मेला भी आयोजित होता है। धार्मिक आयोजन के साथ यह राजस्थान की लोकसंस्कृति, पशुपालन, हस्तशिल्प, संगीत और पारंपरिक जीवनशैली का विशाल उत्सव बन जाता है।
सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश
ब्रह्माजी सृष्टि के निर्माता हैं। इसलिए पुष्कर की यात्रा केवल दर्शन और स्नान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सृष्टि में मौजूद प्रत्येक प्राणी, जलस्रोत, पर्वत और वनस्पति के प्रति संवेदनशील रहना भी ब्रह्मा की आराधना का अंग है।
पवित्र सरोवर में कचरा न डालना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, घाटों की मर्यादा बनाए रखना और स्थानीय संस्कृति का सम्मान करना तीर्थयात्री का दायित्व है। पुष्कर हमें स्मरण कराता है कि जिस सृष्टि को ब्रह्मा की रचना माना गया है, उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का धर्म है।

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