काठ की नाव!

एक काठ की नाव
अपरिमित सागर जल में
गोते खा ,भटक गई थी
ज्वार भाटा से लड़ रही थी
अंग अंग शिथिल हो गया था
नाविक लिए पतवार
साथ छोड़ गया था
निर्जीव तो वह पहले ही थी
अब निरीह भी हो चली थी
कोस रही थी उन पलों को
खिलखिलाती सागर जल में उतरी थी
ध्वजा लहरा रही थी एक छोर
बंधी थी मन्नतों के धागों की डोर
लगे थे चंदन रोली के टीके
धवल पुष्पों से सजी संवरी
शंख ध्वनि आरती पूजा से
इठलाती हुई जल में उतरी थी
आज हिल गया अंजर पंजर
टूट गया छोटा सा लोहे का लंगर
सागर का रोद्र रूप सामने आया
क्यों मेरे वक्ष पर पतवार चलाया
सहम गई सुन कर क्रोध भरे शब्द
जल समाधि ले चुके होंगे
जो कभी मुझ पर सवार थे
मै अकेली लड़ रही हूं जी जान से
अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए
सोचा, डूबने की पीड़ा से वह पीड़ा कम थी
जो मैंने अपना नूतन रूप पाने को, चुभते हुए कीलों से पाई थी
ज्वार तट पर लाता , आशा बंधती
भाटा खीच पुनः सागर में पहुंचाता
जल पाखी उड़ उड़ हस रहे थे
जलचर मेरी खिल्ली उड़ा रहे थे
एक लहर ने कुछ दया दिखाई
छोड़ मुझे तट पर स्वयं लौट गई
दूर-दूर तक सिक्ता बिखरी थी
सागर लहरे डरा रहीं थीं
सुनसान तट पर अकेली पड़ी थी
क्यों नाव आकार में ढली थी
मैं तो वृक्ष से टूटी काष्ठ की डाली भली थी
बदल गया भाग्य मेरा
एक नाविक
खा थपेड़े सागर जल के
तट को था छू पाया
मेरी गोद में बैठ उसने
अपनी चोटों को सहलाया
कुछ आराम किया कुछ सो पाया
अपना अस्तित्व खोने से पहले
मैंने कुछ तो पुण्य कमाया।
बेला विरदी।

अन्य समाचार