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सरकंडे घास सुतली से बनी
एक झांपी,झपोली या टोकरी हूं
बाहर से आकार बड़ा है मेरा
अंदर से खाली खोखली हूं मै
मेरे खोखले पन को न निहारो
जो चाहोगे अपने में
संभाल लूंगी
बिखर जाने की चिंता से मुक्त तुम्हें करुंगी।
कभी सहला कर पूछना
मुझसे कि मै कौन हूं?
मै हूं एक वृद्धा की आशा
एक भूखे परिवार की रोटी हूं मै।
मुझे आकार देते सबके हाथ छिले अंगुलियां कटी
क्योंकि मै सरकंडे से हूं बनी।
सरकंडा कहता अपनी कहानी
अपनी ही ज़ुबानी।
मै नहीं चाहता था अपना वजूद खोना
बहुत ताकत से मैने अपनी जड़ों को मिट्टी से बांधा था।
चौमासे में बादलों ने बरस बरस कर
आकार मेरा बढ़ाया था
एक वृद्धा के परिवार ने मुझको बड़ा सताया था
बारम्बार तांक-झांक कर मुझे देखने आता था
क्या मेरा शरीर छाज टोकरी बनने लायक हो गया था?
जिस दिन मेरे शीश की मंजरी ने
बीज अपना छितराया था ,डर गया मै
मुझे अब बुढ़ापा आया था
सुनहरा हुआ गात मेरा,वृद्धा का परिवार हर्षाया था
काट मुझे हंसिये से भू पर गिराया था।
छील छांट खंड- खंड कर
मेरा प्यारा वजूद मिटाया था
मैंने नहीं गिराये आंसू
भूख परिवार की देख रहा था
कुछ बूंदें वृद्धा के रक्त आंसू की मुझ पर टपकी थी
मैंने अपने पीड़ा को इनमें ही छिपाया था।
भूखे पेट की सिकुड़ती आंतों ने मुझे
झांपी झपोली टोकरी में ढाला था।
शनिवार बाजार में जाकर मै बिक गया चंद सिक्कों में
मुट्ठीभर सिक्कों को बूढ़े हाथों ने सहलाया था
उसी दिन परिवार में चावल दाल बन क्षुधा मिटाने आया था।
बहुत संतुष्ट हूं,रावण का पुतला नहीं बना
भूखे परिवार की भूख मिटा, मै अपना जीवन जी गया।
बेला विरदी।
