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गजबे है : मामा का अलार्म बजा, मोहन सरकार का होमवर्क बढ़ा!

उमा सिंह
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बदल गए, कुर्सी बदल गई, लेकिन सियासी रिमोट का बटन अब भी मामा के हाथ में है क्या? मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता देखकर लगता है कि सरकार का रिपोर्ट कार्ड अब भी पुराने ‘कप्तान’ ही चेक कर रहे हैं। बुधनी में बुलडोजर गरजा तो शिवराज सिंह चौहान का पारा चढ़ गया। आदिवासियों के हक की बात उठी, अफसरों को नसीहत मिली और मोहन सरकार को जनता की फिक्र का पाठ पढ़ा दिया गया। अब सवाल है कि सरकार मोहन भैया चला रहे हैं या मामा की निगरानी समिति? मामा यहीं नहीं रुके। बुलडोजर से शुरू हुई बात सीधे लाड़ली बहनों की जेब तक पहुंच गई। बोले, सहायता राशि तीन हजार रुपए होनी चाहिए। वाह मामा, वाह… तालियां आपके नाम और बजट का इंतजाम मोहन सरकार के नाम। वादा भी याद दिला दिया और जिम्मेदारी भी दूसरे के पाले में डाल दी। राजनीति में इसे कहते हैं, गुड़ भी खाओ और गुलगुले का हिसाब भी दूसरे से मांगो। वैसे मामा की बात में दम तो है। जनता से वादे किए हैं तो वे पूरे भी होने चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि इतने साल सत्ता में रहने के बाद भी वादों की फाइलें बार-बार क्यों खुल रही हैं? बहनों को तीन हजार कब मिलेंगे, यह तो सरकार बताएगी, मगर मामा की मांग ने मोहन भैया के सामने नया हार्ड होमवर्क जरूर रख दिया है। अब इसे बगावत कहें या सियासी सावधानी, इतना तो है कि मामा ने अपनी आवाज का लाउडस्पीकर बंद नहीं किया है। बुधनी में बुलडोजर चला तो भोपाल में सियासी हलचल बढ़ गई। सीएम मोहन यादव के लिए संदेश साफ है कि कुर्सी संभालिए, वादे निभाइए और मामा की नसीहतों के लिए भी कान खुले रखिए। ई मध्य प्रदेश है भैया, यहां मुख्यमंत्री एक हैं, सरकार एक है, मगर सुर्खियों में हिस्सेदारी का हिसाब अब भी दो-दो का चल रहा है। सब गजबे है जी..!

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