अनिल तिवारी
कभी अमेरिका की एक चेतावनी से दुनिया की राजधानियों में हलचल मच जाती थी, लेकिन आज वही अमेरिका कई मोर्चों पर दबाव, प्रतिरोध और अविश्वास से घिरा दिख रहा है। पश्चिम एशिया में उसके सैन्य ठिकानों पर ईरानी हमलों से हुए नुकसान की रिपोर्टों ने उसकी अजेय छवि को गहरी चोट पहुंचाई है।
मजबूर अमेरिका
कुछ रिपोर्टों में उपग्रह तस्वीरों के आधार पर दावा किया गया है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य परिसंपत्तियों को अपेक्षा से अधिक नुकसान पहुंचा। अमेरिका भले इसे सीमित बताए, लेकिन संदेश साफ है, अब उसके अड्डे भी अभेद्य नहीं रहे। सीरिया में भी अमेरिका को अपना सैन्य जमावड़ा समेटना पड़ा। अप्रैल २०२६ में अमेरिकी बलों ने सीरिया के अपने अंतिम बड़े सैन्य अड्डे को अंतरिम सीरियाई सरकार को सौंप दिया। यह वही अमेरिका है, जिसे कुछ वर्ष पहले अफगानिस्तान से भी अत्यंत अपमानजनक परिस्थितियों में निकलना पड़ा था। दोनों घटनाएं बताती हैं कि अमेरिका अब हर युद्ध को अपनी शर्तों पर समाप्त कराने की स्थिति में नहीं है। घरेलू मोर्चे पर भी ट्रंप की मुश्किलें कम नहीं हैं। उनके वैश्विक टैरिफ पैâसलों पर अमेरिकी अदालतों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। हाल ही में अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने ट्रंप के १० प्रतिशत वैश्विक टैरिफ को अवैध ठहराया, जबकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी उनके व्यापक टैरिफ अधिकारों पर रोक लगा चुका था। यानी ट्रंप की आर्थिक दादागीरी को अब अमेरिकी न्यायपालिका भी चुनौती दे रही है।
संयम-संवाद और विश्वास!
दुनिया में भी अमेरिका की पुरानी प्रतिष्ठा कमजोर होती दिख रही है। चीन और रूस तो पहले से ही अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन अब यूरोपीय देशों में भी वॉशिंगटन पर पूर्ण निर्भरता को लेकर बेचैनी है। ट्रंप ने अपने कार्यकाल में टैरिफ, धमकियों और एकतरफा पैâसलों के कारण कई मित्र देशों को भी असहज किया है। हालत यह है कि ईरान संकट जैसे मामलों में अमेरिका को पाकिस्तान जैसे देशों की मध्यस्थता या संपर्क-भूमिका की भी आवश्यकता पड़ रही है, जो कभी खुद अमेरिकी सहायता और संरक्षण पर निर्भर माने जाते थे।
भारत के लिए भी यह परिदृश्य आंख खोलने वाला है। जिस तरह अमेरिका ने अपने कई पारंपरिक संबंधों को तनावपूर्ण बनाया, उसी तरह भारत में भी मोदी सरकार के दौर में पड़ोस और सार्क देशों के साथ रिश्तों में कई बार खिंचाव दिखाई दिया है। नेपाल, मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान, हर मोर्चे पर भरोसे की कमी या चीन की बढ़ती पैठ भारत के लिए चिंता का विषय रही है। बड़ा सबक यही है कि विश्व राजनीति में केवल शक्ति काफी नहीं होती; स्थायी सम्मान के लिए संयम, संवाद और भरोसा भी चाहिए। आज अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि उसके पास ताकत अब भी है, पर भरोसा पहले जैसा नहीं बचा।
