सना खान
हर सुबह राहुल अपने कंधे पर एक पुराना बैग टांगकर स्कूल जाया करता था। उसकी आंखों में बड़े सपने थे। ‘मां, एक दिन मैं इतना बड़ा आदमी बनूंगा कि तुम्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा,’ वह मुस्कुराकर कहा करता था। मां उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दुआ देती और उसकी बातें सुनकर खुश हो जाती। उसे विश्वास था कि उसका बेटा एक दिन जरूर कुछ बड़ा करेगा।
लेकिन जिंदगी ने राहुल के लिए कुछ और ही सोच रखा था। राहुल के पिता दिहाड़ी मजदूर थे। घर की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। कई बार दो वक्त का भोजन जुटाना भी कठिन हो जाता था। ऐसे में परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल पेट भरने का था, भविष्य बनाने का नहीं। एक शाम पिता ने भारी मन से राहुल से कहा, ‘बेटा, अब मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। घर की जिम्मेदारियां अकेले नहीं संभल रहीं।’ राहुल समझ गया कि बात क्या है। उस रात उसने अपनी किताबें खोलीं। पन्ने पलटते-पलटते उसकी नजर उन सपनों पर ठहर गई, जिन्हें वह वर्षों से संजोए बैठा था। उसने अपनी पसंदीदा किताब को सीने से लगाया और धीरे से बैग में रख दिया।
अगली सुबह स्कूल की घंटी तो बजी, लेकिन राहुल कक्षा में नहीं था। वह एक निर्माण स्थल पर र्इंटों के ढेर के बीच खड़ा था। उसके हाथों में कलम की जगह सीमेंट की टोकरी थी। उसके हमउम्र बच्चे पाठ पढ़ रहे थे और वह जीवन का कठिन पाठ सीख रहा था। समय बीतता गया। राहुल बड़ा हो गया, मगर उसके भीतर कहीं वह बच्चा आज भी जिंदा है, जिसने अपने सपनों को हालात के हाथों खो दिया था। हमारे समाज में ऐसे अनेक बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई उनकी इच्छा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी से छूट जाती है। वे सपने देखना नहीं छोड़ते, लेकिन उन्हें पूरा करने का अवसर खो देते हैं।
