मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : चुनावी हिसाब-किताब

अवधी व्यंग्य : चुनावी हिसाब-किताब

एड. राजीव मिश्र मुंबई
चुनाव के रिजल्ट आइके आज चारि दिन होइ गवा। चुनाव में मिली बवंडर हार से नेताजी के मानसिक स्थिति गड़बड़ाइ गई है। रात में रहि-रहि के सनपाति जाति हैं। नींद में बिस्तर से उठिके जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारा लगावत दुआरे दउरय लागत हैं। नेताजी के जितना चेला-चपाटी रहे लगभग सब भूमिगत होइ गएँ हैं। नेताजी जेहिके आपन इलेक्शन हेड बनाये रहें, जेहिके पीछे लाखन रुपिया खर्च कइ दिहिन, उ परिणाम वाले दिन जीतय वाले प्रत्याशी के कान्हें पर उठाए फोटू खिंचवाइ रहे हैं। जउने दिन से फेसबुक पे फोटू देखे हैं तब से इंसानियत पर से नेताजी के भरोसय उठि गवा है। आखिर एक दिन उनके कउनउ रिश्तेदार कहिन कि एक काम करो समीक्षा मीटिंग बुलवाओ अउर ओहिमे अपने ऊ सारे चेला-चपाटी के बुलवाओ जे तुम्हारे पास से अच्छा-खासा माल चुनाव के दौरान खींचे है। ई बात नेताजी के दिमाग में घुसि के बईठ गई। आखिर आवे वाले अयितवार के समीक्षा मीटिंग के एलान भवा। जितना लोग नेताजी से पइसा, दारू अउर मुर्गा लिए रहें सब के मीटिंग में बुलवावा गवा। सब समय पे आइ गए, थोड़ी देर बाद मीटिंग शुरू भई। नेताजी गला खंखार के बोले, अइसा है चुनाव के परिणाम तो सब लोगन के पता चलिये गवा होहिहै? जउने हिसाब से तुम सब लोग हमरे जीत के घनघोर घोषणा किये रह्यौ, ओहिके तो हवा निकरि गयी। अब जवन रुपिया-पइसा हमसे अइठे रह्यौ तुम सब, चुनाव के समीक्षा के साथ-साथ ओहिका भी हिसाब-किताब जरूरी है। का कहत हौ खदेरन? अब हम का कही? हम तो दिन-रात मेनहत किये रहे। चौहान बस्ती के लगभग पचास वोट तो मिलबे किया है। तुम का कहत हौ चक्खन? नेताजी अपने इलेक्शन-हेड से पूछे। भैया पहिली बात तो ई बात हमसे पुछबय न करो, काहीके हमरी वजह से बभनौटी के लगभग एक सौ तीस ओट मिला है। अब हार-जीत तो लगी रहत है। आज हम भले हारि गएँ हैं पर कल जीत भी मिली। इतना सुने के बाद नेताजी घर के अंदर से एक हाथ में एक ठो कागज और दूसरे में मुनरी लगी लाठी लइके निकरे। उ कागज चेलन के सामने रखि दिये जेहिमा नेताजी के कुल ओटन के संख्या ६ लिखी रही। कागज पढ़य के बाद नेताजी चेलन पर लाठी लइके पिली परे और दुइ मिनट मा समीक्षा के जब हिंसक अंत भवा तब से एक्कउ चेला नेताजी के सामने नही परे।

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