एड. राजीव मिश्र, मुंबई
आज सुबहिये से बनवारी के घर के माहौल कुछ अलग जानि परत है। बनवारी के घर के हवा में मानो डर अउर खौफ के सनसनाहट लगत बा। बनवारी के करेजा में रहि-रहि के गोला की नाय घूमि रहा है। तब तक अंदर से बनवारी के मेहरिया गुलाबो पायल छनकावत निकरी अउर बनवारी से बोली- सुनत हयऽ हो…! बनवारी के करेजा अंदर तक कांपि गवा तबउ करेर होइ के बोले- का है गुलाबो? का हौ मतलब? पूरा जग जानत है कि काल करवा चउथ है अउर तुमका पतय नही है। अरे हां… गुलाबो, याद आइ गवा। याद आइ गवा तो अब बजार चलो अउर कल के लिए खरीददारी करवाओ। कल करवा चउथ है तो मेहरारू के कपड़ा-लत्ता और साज-सज्जा के समान चाही कि न चाही? बस गउखा जइसन मुंह बनाये बैठा हौ। गुलाबो के रूप देखिके बनवारी के मानो करेजा बैठि गवा होय। खैर बनवारी अपने मेहरारू गुलाबो के लइके बजार पहुंचे। चार घंटे के बाद कुल दस हजार के खरीददारी करे के बाद गुलाबो बसंत बहार होटल मा जमिके पेट पूजा किहिन और बनवारी के साथ घर पहुंची। खैर बनवारी ई सोच के आपन मन मारि लिहिन कि आखिर गुलाबो भिनसहरे से हमरे लंबी उमर खातिर निर्जला व्रत रही, मुला उनकर कहा मानय मा कउनउ बुराई नही है। यही सोचिके बनवारी चुप्पय बैठि गए। दूसरे दिन भोरहरिये गुलाबो बनवारी के झकझोरि के जगार्इं। अरे उठो, कुम्भकरन के नाय सोय रहे है। ई लो, पानी पियो…पानी ! का है गुलाबो इतना भिनुसारे कबहुं हम पानी पिए हैं? अरे तुम पिये हौ या नही पिये हौ ई सब से हमका कुछउ नही लेना-देना पर आज पियो। इतना दिन से हम तोहरे लंबी उमिर खातिर भूखे-पियासे रहि गए, अउर तू मजे से कचौड़ी-समोसा उड़ायऽ, पर अब ई नाहीं चली। आज व्रत तू करिहा!’ बनवारी सकुचाइ के बोले, ‘भागवान, व्रत तौ तुम करत हौ। हम काहे करी?’ गुलाबो आंखि तरेर के बोली, तो खाओ आज कुछउ हमहूं देखित थ। इतना कहिके गुलाबो बनवारी के छाती पे चढ़ि के मुंह में पट्टी बांधय लगी अउर बनवारी बचाओ-बचाओ कहिके जोर-जोर चिल्लाए लागें अउर इही बीच बनवारी के नींद खुलि गय। बनवारी तब से घर से भागे तो आज तक घर नही लौटे।
