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संपादकीय : अकालग्रस्तों की पीठ में खंजर!

महाराष्ट्र के अकालग्रस्तों के पीछे सरकार मजबूती से खड़ी है, ऐसा ढिंढोरा मुख्यमंत्री फडणवीस उठते-बैठते पीटते रहते हैं। असलियत में तस्वीर क्या है? सत्ताधारियों के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग हैं। जिस पांच हजार रुपए की अग्रिम मदद का डंका सरकार ने पीटा था, वह मदद भी अब केवल पंचनामा पूरा होने वाले और तैंतीस प्रतिशत से ज्यादा नुकसान उठाने वाले किसानों को ही दी जाएगी। मदद का यह कौन-सा तरीका कहा जाए? सरकारी दायरा, मानक, नियम वगैरह ठीक हैं, परंतु इस बार का अकाल बेहद भयानक है। ऐसे भीषण अकाल में भी क्या सरकार हमेशा के अपने मानक और नियमों का शिकंजा किसानों पर कसेगी? यदि सरकारी तरीका ही अपनाना है, तो ये पंचनामे जल्द-से-जल्द कैसे पूरे होंगे, इस पर ध्यान दीजिए। मदद की घोषणा तत्काल करने का ढिंढोरा पीटा था न! तो अब घोषित की गई पूरी मदद प्रत्येक अकाल-पीड़ित किसान की झोली में जल्द-से-जल्द कैसे पहुंचे, यह भी देखिए। इस मदद पर आप अपने पारंपरिक मानकों और पंचनामों की कैंची क्यों चला रहे हैं? इस बार इन नियम-मानकों को ताक पर रखना ही होगा। वरना डेढ़ करोड़ में से आधे अकाल-पीड़ित किसान बमुश्किल पांच हजार रुपये की इस मदद से भी वंचित रह जाएंगे। राज्य के किसान और आम जनता गंभीर
अकाल की मार
लगातार सह रही है। खरीफ की फसल आई ही नहीं और रबी की तो बुआई होने की भी संभावना नहीं है। बारिश न होने के कारण पीने के पानी से लेकर मवेशियों के चारे तक अनगिनत सवाल आज खड़े हैं। इन समस्याओं के शिकंजे में किसान फंस चुका है। उसमें महाजनों का शिकंजा है ही। अकाल के वक्त किसानों के पीछे कर्ज वसूली का तकाजा लगाने वाले और उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली फाइनेंस कंपनियों पर सीधे मुकदमे दर्ज करने के आदेश मुख्यमंत्री ने दिए हैं, ऐसा कहा जाता है। तो फिर भी महाजनों और निजी फाइनेंस कंपनियों के तकाजे क्यों बंद नहीं हुए? उनके तकाजों और जुल्म से तंग आकर ही नांदेड़ और लातूर के किसानों ने अपनी जान दे दी। क्या मुख्यमंत्री के ये आदेश नांदेड़ और लातूर जिलों तक नहीं पहुंचे हैं? ये दोनों जिले महाराष्ट्र में ही हैं ना? मुख्यमंत्री घोषणाएं तो बड़े जोर-शोर से कर रहे हैं, परंतु उनके अमल में आते-आते उनकी सारी हवा निकल जा रही है। पहले से ही इस सरकार की अकाल-नियोजन को लेकर हालत पस्त है। इसमें सरकारी घोषणाएं यानी हवा के बुलबुले साबित हो रही हैं। अब राज्य से मानसून के वापसी के दो-तीन हफ्ते बीत जाने के बाद इस सरकार को अकाल-संबंधी कामों की हिचकी आई है। अब तक सोए पड़े मृदा और जलसंधारण विभाग अचानक नींद से जागा है। इस विभाग ने हर गांव में सौ सोख्ता गड्ढे खोदने के आदेश दिए हैं। सत्ताधारियों ने अपनी
अक्ल गिरवी
रख दी है, इसी का यह सबूत है। इस बार अकाल पड़ेगा, यह अंदाजा मिलते ही यदि इस पैâसले पर अमल किया जाता, तो कम से कम कुछ फायदा जरूर होता। अब जब बारिश ही नहीं है, तो इसके आगे खोदे जाने वाले हजारों-लाखों गड्ढे पानी से कैसे भरेंगे? क्या सरकार उनमें टैंकर से पानी डालेगी? यही बात नालों के चौड़ीकरण और गहरीकरण की है। सत्ताधारियों का यह अकाल-पीड़ित जनता के लिए नहीं, बल्कि ठेकेदारों के लिए और सरकार के भीतर छिपे विभीषणों के लिए है। अकाल-पीड़ितों के `गले’ सूखे रखने वाले ये फैसले दूसरों के `पल्ले’ (जेब) जरूर भरेंगे। महाराष्ट्र के डेढ़ करोड़ अकाल-पीड़ित किसानों के लिए मुख्यमंत्री द्वारा घोषित पांच हजार रुपए की अग्रिम मदद की घोषणा भी झूठी और खोखली ही साबित हुई। क्योंकि अब ये पांच हजार रुपए केवल पंचनामा पूरा होने वाले और तैंतीस प्रतिशत से ज्यादा नुकसान उठाने वाले किसानों को मिलने वाले हैं। यह तरीका अमानवीय और क्रूर है। यह सरकार दुष्काल-पीड़ित किसानों की पीठ पर मजबूती से खड़ी रहने वाली नहीं, बल्कि उनकी पीठ में तैंतीस प्रतिशत का `खंजर’ घोंपने वाली है। महाराष्ट्र का अकाल तो भयानक है ही, परंतु सत्ताधारियों की घोषणाओं का बाजार और इन घोषणाओं पर उनके ही प्रशासन द्वारा अड़ंगा डालने वाला पात्रता का `अल नीनो’ अकाल से भी कहीं ज्यादा भयानक है।

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