मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : नेपोटिज्म और टेलेंट... क्या है सफलता का आधार

तड़का : नेपोटिज्म और टेलेंट… क्या है सफलता का आधार

कविता श्रीवास्तव

फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद की चर्चाएं सुनने में आती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि फिल्मी परिवारों से आने वाले कलाकारों को अन्य की तुलना में अधिक अवसर, बेहतर काम और आसानी से पहचान मिल जाती है। वैसे, यह बात काफी हद तक सच भी है। लेकिन क्या किसी कलाकार के माता-पिता का फिल्मी दुनिया से जुड़ा होना ही उसकी सफलता का आधार होता है। क्या उसे प्रतिभा, मेहनत और संघर्ष की जरूरत नही होती है? अभिनेत्री सारा अली खान ने इसी सवाल की ओर ध्यान खींचा है। नेपोटिज्म की बात पर उनका कहना है कि किसी कलाकार की सफलता को केवल उसके पारिवारिक संबंधों के चश्मे से देखना उसके व्यक्तिगत प्रयासों को कमतर करता है। सारा की मां अमृता सिंह और पिता सैफ अली खान दोनों फिल्म जगत के जाने-पहचाने नाम हैं। वे एकदूसरे से अलग हो चुके हैं। सारा की परवरिश मुख्य रूप से उनकी मां के साथ हुई है। सारा का कहना है कि उनकी पेशेवर यात्रा में उनके पिता की कोई भूमिका नहीं रही। इसलिए उनकी सफलता को केवल इस आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए कि वे एक फिल्मी परिवार से आती। किसी कलाकार को फिल्मी परिवार से होने का लाभ मिला या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। लेकिन उसने अपने काम में कितनी मेहनत की, अपनी प्रतिभा को कितना निखारा और दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए क्या प्रयास किए, यह महत्वपूर्ण है। अवसर किसी को शुरुआत दिला सकता है, लेकिन लंबे समय तक दर्शकों का विश्वास अर्जित करने के लिए काम की गुणवत्ता भी मायने रखती है। हालांकि, फिल्म उद्योग में स्थापित परिवारों के बच्चों को संपर्क, संसाधन, प्रशिक्षण और शुरुआती अवसर मिलने की संभावना अधिक होती है। बाहरी कलाकारों को संघर्ष करना पड़ता है। यही सिद्धांत राजनीति, क्रिकेट, अन्य खेलों और कारोबार पर भी लागू होता है। राजनीतिक परिवार से कोई व्यक्ति राजनीति में आए या क्रिकेटर का बेटा क्रिकेट में आए तो उसकी क्षमता का मूल्यांकन उसके प्रदर्शन से होना चाहिए। कारोबारी परिवार की अगली पीढ़ी व्यवसाय संभाले तो उसमें योग्यता भी होनी चाहिए। लेकिन परिवार के प्रभाव से अवसरों पर एकाधिकार स्थापित हो, दूसरों की राह रोकी जाए तो उस पर सवाल उठाना भी उतना ही जरूरी है। लेकिन किसी की पारिवारिक पृष्ठभूमि को उसकी एकमात्र पहचान बना देना भी गलत है। समाज को प्रतिभा का सम्मान करना चाहिए, पर अवसरों की असमानता पर सवाल उठाने से पीछे भी नहीं हटना चाहिए। नेपोटिज्म के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है, लेकिन उस बहस में मेहनत और प्रतिभा के लिए भी जगह होनी चाहिए। किसी को केवल उसके माता-पिता के कारण खारिज करना उतना ही अनुचित हो सकता है, जितना किसी को केवल उसके माता-पिता के कारण आगे बढ़ाना। यह सही है कि पहचान शुरुआती दरवाजा खोल सकती है, लेकिन अंतिम मूल्यांकन योग्यता, परिश्रम, प्रदर्शन और उपलब्धियों के आधार पर ही होता है।

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