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मुस्लिम वर्ल्ड :  मुश्किल में सऊदी अरब!..प्रिंस ने सगे भाई को क्यों भेजा ईरान?

सूफी खान

सऊदी अरब ने जुलाई २०२६ में यमन के अंसारुल्लाह पर हमला तो कर दिया, लेकिन अब वह खुद फंस गया है। उसकी स्थिति ऐसी बन गई है कि उसे ईरान की चौखट पर जाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सऊदी अरब के लिए ‘वॉर ऑफ चॉइस’ थी। वह यमन के अंसारुल्लाह को न छेड़ने का पैâसला भी ले सकता था। पहले सऊदी ने सैन्य युद्ध का रास्ता चुना और अब हूतियों के साथ बातचीत की मेज पर बैठकर समझौता करना चाहता है। लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं हो पा रहा है, क्योंकि हूती जो मांगें कर रहे हैं, उन्हें सऊदी अरब अपनी हार के तौर पर देख रहा है। सऊदी के सैन्य बुनियादी ढांचे और आर्थिक मोर्चे पर जिस तरह नुकसान हो रहा है, उससे लगता है कि अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है। ऐसे में हूतियों से टकराकर बुरी तरह फंसे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस बार किसी और पर नहीं, बल्कि अपने सगे भाई पर भरोसा जताया। सऊदी की ओर से किसी राजनयिक के बजाय अपने रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान, जो क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के भाई हैं, को तेहरान भेजना दिखाता है कि सऊदी इस बैठक को सिर्फ एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि सुरक्षा और तनाव कम करने की गंभीर कवायद मान रहा है। वह मोहम्मद बिन सलमान के सगे भाई हैं, इसलिए उनकी बात सीधे रियाद की नीति के बराबर मानी जाती है।
प्रिंस खालिद बिन सलमान साल २०२२ से सऊदी के रक्षा मंत्री हैं। इसलिए हूती हमलों, यमन युद्ध और सैन्य तनाव के मामलों में उनके पास अधिकार और जानकारी, दोनों हैं। वह रॉयल सऊदी एयर फोर्स में एफ-१५ लड़ाकू विमान के पायलट रह चुके हैं और कई अभियानों में हिस्सा ले चुके हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रिंस खालिद बिन सलमान वह चेहरा हैं, जो ईरान से बात कर सकते हैं, अमेरिका को समझा सकते हैं और सऊदी सेना का भी प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। यही वजह है कि ईरान से बातचीत के लिए उन्हें चुना गया। सऊदी अरब जानता है कि हूतियों के लगातार हमलों को रोकने का रास्ता ईरान से होकर ही गुजरता है। इसलिए उसने ईरान से सीधे बातचीत करना जरूरी समझा। लेकिन युद्ध के इस मोड़ पर हूतियों की मांगें स्पष्ट हैं। वे कह रहे हैं कि सऊदी पहले उन पर बरसों से लगाए गए हवाई प्रतिबंध हटाए। साथ ही, समुद्री नाकेबंदी भी खत्म करे। इसके अलावा, यमन के तेल और गैस जैसे संसाधनों से होने वाली कमाई, जिसका लाभ सऊदी समर्थित सरकार के जरिए उठाया जा रहा है, उसमें से हूती चाहते हैं कि सऊदी अरब उनके नियंत्रण वाले इलाकों में सरकारी कर्मचारियों को वेतन दे।
क्या सऊदी को हूतियों की ये सभी मांगें माननी पड़ेंगी, जिन्हें स्वीकार करना वह अपनी हार के तौर पर देखता रहा है? यह बड़ा सवाल है।

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