एड. राजीव मिश्र, मुंबई
नातेदारी में फूफा एक अइसन रिश्ता अहइ, जेहिके खुश होए के गुंजाइश एक प्रतिशत अउर नाराज होए के संभावना ९९ प्रतिशत होत है। ज्यादातर कार्यक्रम में फूफा लोग अपने ससुराल के बुराई करय वाले पड़ोसी से चिपक के बतियावत मिलि जइहैं। बातचीत के दौरान बार-बार ‘हमरा बियाह जब भवा रहा’ जइसन आवाज सुनाई पड़त रही। इनका नाटक भी अलग लेबल के रहत है। ससुराल में कउनउ काज परोजन पड़ि जाय तो इनका नाराज होए के सीजन शुरू होइ जात है। नेवता आवा तो फून नहीं किये, फून किये तो फलाना किये, ढिमका कांहें नहीं किये। शादी विवाह में केउ अगर उनसे बिचार-बिमर्ष नहीं किया तो समझौ फूफा हर चीज में खोंज निकरिहैं। इहमा ई गड़बड़ी होइ गयी। जब तक हमसे केउ राय न मांगी हम आपन राय कहिके देई अउर वैसहू जब तक केउ मांगय नहीं तब तक राय नही देवय के चाही। अब अइसने एक घटना रामअजोर के बिटवा के शादी में होइ गयी। रामअजोर के जीजा, चरनजीत सुभाव के तो चिल्लर रहबै किये वहिपय जीजा अउर कालांतर में फूफा बनि गए। पहिले तो अजोर भैया फोन किहिन, जीजा पालागी! जिया जिया अजोर भइया। का हालचाल है? हालचाल सब ठीकय अहइ जीजा, इहै छोटकना के बियाह पड़ि गय अहइ, उही के तैयारी में लागि अही। का? छोटकना के बियाह तय कइ दिहो अउर हमका कानोंकान खबर तक नहीं भई। अब का कही जीजा, हमरे ससुराल से एक ठो रिश्ता आवा अउर लड़की नीक रही यहि कारन हम बियाह मानि लीन्हो। छोड़व जीजा, गलती होइ गयी। एक बात सुनो, हमरे बड़कऊ तुम्हरे लिए लुधियाना से एक ठो सदरी लइके आएं हैं। जब पहिनिहौ तो पूरे बरात मा तुमही चमकिहौ। सदरी के नाम सुनै के बाद चरनजीत के गुस्सा साबुन के झाग जइसे बैठि गवा। जइसे तइसे बियाह के दिन आइ गवा। दुआरे पहुंचतय चरनजीत रामअजोर से कहे, अजोर कहां है तुम्हरी सदरी? अजोर अपने बड़िका लड़िका के बुलाय के कहें, सुन बाबू, बरात के टाइम होइ गवा है, फूफा वाली सदरी लेइ आओ। कउन सदरी? उ तो हम जीजा खातिर लेइ आइ रहे! इतना सुनतै लगा जइसे चरनजीत के बदन से केउ कुर्ता पैजामा भी खींचि लिए होय। रामअजोर लाख हाथ-गोड़ जोरिन के गलती होइ गयी पर चरनजीत मोटरसाइकिल उठाये अउर अपने घर निकरि गएं।
