सामना संवाददाता / मुंबई
‘बार्क’ का फर्जी वैज्ञानिक बनकर संवेदनशील परमाणु डेटा के आदान-प्रदान के लिए करोड़ों रुपए की विदेशी धनराशि प्राप्त करने की सनसनीखेज जानकारी हासिल हुई है। मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के सूत्रों के अनुसार, हुसैनी बंधुओं को १९९५ से विदेशी धन मिलना शुरू हुआ था। शुरुआत में उन्हें लाखों रुपए दिए गए, लेकिन साल २००० के बाद उन्हें करोड़ों रुपए दिए गए। संदेह है कि यह पैसा बार्क और अन्य परमाणु संयंत्रों से संबंधित गुप्त ब्लूप्रिंट के बदले दिया गया था।
झारखंड का मकान बेचा
हुसैनी ने १९९६ में झारखंड स्थित अपना पैतृक मकान बेच दिया था, लेकिन अपने पुराने संपर्कों की मदद से फर्जी दस्तावेज हासिल करना जारी रखा। अख्तर हुसैनी को पिछले हफ्ते मुंबई पुलिस ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र का वैज्ञानिक होने का झूठा दावा करते हुए देशभर में यात्रा करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। झारखंड के जमशेदपुर निवासी हुसैनी के पास से परमाणु हथियारों से संबंधित १० से ज्यादा नक्शे और कथित डेटा भी जब्त किया गया है।
वेश बदलकर दुबई में रह रहा था फर्जी वैज्ञानिक!
मुंबई में गिरफ्तार बार्क के फर्जी वैज्ञानिक हुसैनी के मामले में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। जांच में पता चला है कि इनमें से एक भाई दुबई में वेश बदलकर रह रहा था। पता चलने के बाद उसे निर्वासित कर दिया गया था।
पुलिस को जांच के दौरान अख्तर हुसैनी के नाम से एक निजी बैंक खाता भी मिला, जिसमें संदिग्ध लेन-देन हुए हैं। पुलिस ने अब धन की सही राशि और स्रोत का पता लगाने के लिए बैंक से पूरे लेन-देन का विवरण मांगा है। दोनों भाइयों ने अपने द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे कई अन्य बैंक खाते भी बंद कर दिए थे। पुलिस धन के पूरे लेन-देन का पता लगाने के लिए पुराने खातों के रिकॉर्ड की जांच कर रही है।
पुलिस को शक है कि दोनों भाई छिपकर पाकिस्तान भी जा चुके थे और और वहां उनकी मुलाकात आईएसआई से करवाई गई थी। अख्तर अपनी पहचान बदलकर और भेष बदलकर दुबई में भी रहा। २००४ में उसे गोपनीय दस्तावेज रखने वाला वैज्ञानिक होने का दावा करने के बाद दुबई से निर्वासित कर दिया गया था।
