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कुंभ से पहले अखाड़ों में संग्राम!

-१३ अखाड़े ८ बनाम ५ में बंटे प्रशासन की बढ़ी चिंता

सुनील ओसवाल / मुंबई

नासिक सिंहस्थ कुंभ-२०२७ से पहले अखाड़ों की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। १३ अखाड़ों में से आठ एकजुट हो गए हैं, जबकि पांच अखाड़ों ने अलग राह पकड़ ली है। इस घटनाक्रम ने कुंभ मेले की तैयारियों के बीच प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। आशंका है कि अखाड़ों की यह अंदरूनी खींचतान मेले की व्यवस्थाओं और आपसी समन्वय को प्रभावित कर सकती है।
हरिद्वार में आयोजित बैठक में आठ अखाड़ों ने एक मंच पर आकर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नए पदाधिकारियों की घोषणा की। परिषद के अध्यक्ष के रूप में महंत रवींद्र पुरी महाराज का चयन किया गया, जबकि अन्य प्रमुख पदों पर भी नई नियुक्तियां की गईं। बैठक में गोदावरी नदी को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने का संकल्प भी लिया गया। दूसरी ओर, पांच अखाड़ों ने परिषद से अलग रहने का पैâसला किया है। इनमें प्रमुख वैष्णव और शैव परंपरा के अखाड़े शामिल हैं। दिगंबर अखाड़ा पहले ही प्रशासन को स्वतंत्र रूप से अपना पत्र सौंप चुका है। दरअसल, अखाड़ों के बीच मतभेद कोई नया विषय नहीं है। नाशिक के पिछले सिंहस्थ कुंभ के दौरान भी वैष्णव अखाड़ों के बीच विवाद सामने आया था। इसके बाद प्रयागराज कुंभ में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नेतृत्व को लेकर मतभेद और गहरा गए। पूर्व अध्यक्ष नरेंद्रगिरि महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद परिषद दो गुटों में बंट गई थी और दोनों पक्षों ने अलग-अलग अध्यक्ष घोषित कर दिए थे।
चुनौती बनकर उभरी खेमेबाजी
हरिद्वार की ताजा बैठक के बाद यह विभाजन एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। कुंभ जैसे विशाल आयोजन में शाही स्नान, पेशवाई, शिविरों की व्यवस्था और धार्मिक कार्यक्रमों के सफल संचालन के लिए सभी अखाड़ों का आपसी सहयोग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यह खेमेबाजी प्रशासन के लिए नई चुनौती बनकर उभरी है। सिंहस्थ कुंभ-२०२७ की तैयारियां तेज हो चुकी हैं, लेकिन अखाड़ों की बदलती राजनीति ने संकेत दे दिए हैं कि इस बार प्रशासन को केवल आधारभूत व्यवस्थाओं की ही नहीं, बल्कि साधु-संतों के अलग-अलग गुटों के बीच समन्वय और संतुलन बनाए रखने की भी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है।

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