नवीन सी. चतुर्वेदी
हमें चाहिए आजादी – भाग १
नांय बत्तो, अभी तौ नांय सुने! अब तू आयी है तौ धीरें-धीरें बिना पूछें सबरे गाम के समाचार सुनवे कों मिलंगे! तू आय जावै तौ दुनिया-जहान की खबर तौ मिल जावै मोय, नहीं तौ कौन है जो बिना पैसा कौ अखबार पढ़ावै, वौ हू विवेचना’न के संग!
घुटरू तेरी ये बातें ही मोय अच्छी नांय लगें! एक तौ मैं तोकों सबरे गाम की खबर सुनाओं, ऊपर सों तेरी टोंटिंग सुनों! ऐसी बावरी मैं ही तौ हों! जा मैं नांय सुनाय रही कोऊ खबर-वबर तोकों!
अरी भेंन बत्तो, रूठ मत! वैसें हू यै तेरौ ताजमहल की गुम्बद जैसौ चेहरा रूठते भये अच्छौ नांय लगै! चल बताय का समाचार हैं जंगल के!
घुटरू, बुद्धूबक्सा पै खबर आयी है कि जंगल में आजकल सब जने चारों तरफ नारे लगाय रहे हैं कि ‘हमें चाहिए आजादी, आजादी, आजादी।’ बुद्धूबक्सा वारे दिनभर हर पांच-सात मिनट पै ब्रेकिंग-न्यूज बताय-बताय कें यै एक ही खबर रिपीट करें जाय रहे हैं! इन मरे बुद्धूबक्सा वारे’न पै जैसें कोऊ दूसरौ समाचार है ही नाँय दिखायवे कों!
बत्तो, बुद्धूबक्सा तौ जब सों अस्तित्व में आयौ है, ऐसौ ही है! या दुकान के अबतक अनेक मालिक बदल चुके, अनेक साइन बोर्ड बदल चुके, अनेक कर्मचारी बदल चुके, मगर मजाल है कि काऊ नें परम्परा तोरी होय! कभूकभार परिवर्तन के नाम पै रंग-रोगन बदल देमें, कभूकभार चेहरा-मोहरा बदल देमें और कभूकभार टोन हू बदल देमें। बिचारी सीधी-सादी पब्लिक कों लगै कि ये हुई न बात, ये हुई क्रांति! मगर बत्तो, एट एंड ऑफ द डे परिणाम वौ ही रहै, ढाक के तीन पात! पब्लिक तौ जहां हुती वहां ही है! खैर तू छोड़ इन सब बात’न कों और यै बताय कि ये कौन जीव-जन्तु हैं जो आजादी मांग रहे हैं? कौन ते मांग रहे हैं, और काय बात की आजादी मांग रहे हैं?
घुटरू यै नांय बतायी गयी। बस भीड़ दिखाई और नारे सुनवाये कि ‘हमें चाहिए आजादी, आजादी, आजादी।,’ कछू एक जीव-जन्तु हाथ में एक किताब हू पकरें भये हुते, है सकै वौ जंगल के कानून की किताब होय! अब ऐसौ है मोय एक जरुरी काम याद आय गयौ है। मैं चलों। बाकी बात तोय अगली बार बताओंगी!
यै छबी हमनें ही उकेरी है
रात जगमग दुपैर अंधेरी है
