क्या एक औरत
कामयाब नहीं हो सकती?
क्या वो कभी
आसमान को छू नहीं सकती?
क्या वो अपने ख्वाबों को
बुन नहीं सकती?
क्या वो अपनी ही बनाई जिंदगी में
खुश नहीं रह सकती?
क्यों जमाना
उसके हर कदम पर सवाल उठाता है?
क्यों उसकी उड़ान से पहले
उसके पंखों का हिसाब लगाता है?
क्यों उसकी तरक्की
किसी को दिखाई नहीं देती,
और उसकी एक छोटी-सी भूल
पूरी दुनिया को दिखाई देती है?
क्यों पंख काटने में
इतना सुकून मिलता है इस ज़माने को,
जबकि वही पंख
एक दिन आसमान बदल सकते हैं?
और कब समझेंगे लोग-
वो एक औरत है,
आपकी कठपुतली नहीं…
जो आपके इशारों पर नाचे।
उसके भी ख्वाब हैं,
उसकी भी उड़ान है,
उसकी भी अपनी पहचान है।
उसे रोकना मत…
उसे उड़ने दो।
-स्नेहा त्रिपाठी
पुणे
