-पहली बार वाईवाई-२० ने हवा में भरा राफेल में ईंधन
-जे-१६ के साथ युद्धाभ्यास के बाद नई तस्वीर ने बढ़ाई भारत की रणनीतिक चिंता
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी वायुसेना के चीनी जे-१०सी और भारतीय राफेल के बीच हुई हवाई भिड़ंत के करीब १६ महीने बाद चीन ने राफेल के साथ सैन्य इंटरऑपरेबिलिटी का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया है। मिस्र में चल रहे ‘ईगल्स ऑफ सिविलाइजेशन-२०२६’ संयुक्त युद्धाभ्यास के दौरान चीन के वाईवाई-२०ए टैंकर विमान ने फ्रांस निर्मित मिस्र के राफेल लड़ाकू विमान में हवा में ही र्इंधन भरा है।
मिस्र की सेना की ओर से जारी तस्वीर में दो सीट वाला राफेल-बी चीनी वाईवाई-२०ए के रिफ्यूलिंग होज से जुड़ा दिखाई देता है। बाद में इस तस्वीर को चीनी सैन्य माध्यमों ने भी साझा किया।
यह पहला सार्वजनिक रूप से दर्ज मामला माना जा रहा है जब चीन के किसी हवाई टैंकर ने पश्चिमी देश में निर्मित लड़ाकू विमान को हवा में र्इंधन दिया है। इससे पहले पिछले वर्ष इसी अभ्यास में वाईवाई-२०ए ने मिस्र के रूसी मूल के मिग-२९एम२ विमानों को र्इंधन दिया था।
पहले जे-१६ बनाम राफेल, अब टैंकर भी जुड़ा
इस वर्ष के अभ्यास को भारत के नजरिये से महत्वपूर्ण बनाने वाली बात सिर्फ हवाई रिफ्यूलिंग नहीं है। चीन पहली बार अपने भारी लड़ाकू जे-१६ विमानों को अप्रâीका लेकर गया है और ये मिस्र के राफेल विमानों के साथ हवाई युद्ध प्रशिक्षण में हिस्सा ले रहे हैं।
चीन ने जे-१६ के अलावा वाईवाई-२०ए टैंकर, वाई-२०ए परिवहन विमान, केजे-५०० एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान, वाई-९ इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर विमान और जेड-२० हेलिकॉप्टर भी मिस्र भेजे हैं।
चीनी जे-१६ ने मिस्र पहुंचने के लिए ६,००० किलोमीटर से अधिक की उड़ान भरी। रास्ते में वाईवाई-२०ए ने उन्हें हवा में र्इंधन दिया और कथित रूप से एयरबोर्न कमांड प्लेटफॉर्म की भूमिका भी निभाई। यह चीन की लंबी दूरी पर पूरी वायुसेना पैकेज तैनात करने की बढ़ती क्षमता का प्रदर्शन है।
भारत क्यों रखेगा इस पर नजर?
भारत के लिए सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि मिस्र के पास भी प्रâांस निर्मित राफेल हैं। चीनी जे-१६ पायलटों को अब वास्तविक राफेल के साथ अभ्यास करने का अनुभव मिल रहा है। इससे चीन को राफेल के उड़ान व्यवहार, युद्धाभ्यास पैटर्न और कुछ ऑपरेशनल विशेषताओं को समझने का अवसर मिल सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि चीन को भारतीय राफेल की गोपनीय क्षमताओं तक सीधी पहुंच मिल गई है। भारतीय वायुसेना के राफेल में भारत-विशिष्ट संवर्द्धन, हथियार और अलग परिचालन प्रक्रियाएं हैं। इसलिए मिस्र के राफेल से हासिल अनुभव को भारतीय राफेल पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकता।
ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि
मई २०२५ में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी जे-१०सी और भारतीय लड़ाकू विमानों के बीच लंबी दूरी की हवाई लड़ाई हुई थी। अमेरिकी अधिकारियों ने बाद में रॉयटर्स को बताया था कि पाकिस्तान के चीनी निर्मित जे-१० ने कम से कम दो भारतीय विमान गिराए थे और उनमें कम से कम एक राफेल था।
बाद में रॉयटर्स की विस्तृत जांच में यह भी सामने आया कि राफेल की तकनीक से अधिक बड़ा मुद्दा भारतीय पक्ष द्वारा चीनी पीएल-१५ मिसाइल की वास्तविक मारक दूरी का गलत आकलन हो सकता था।
इसलिए मिस्र में चल रहा अभ्यास केवल ‘राफेल बनाम चीनी विमान’ की कहानी नहीं है। चीन अपनी लड़ाकू, टैंकर, चेतावनी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और परिवहन क्षमताओं को एक साथ हजारों किलोमीटर दूर तैनात करके एक पूर्ण वायु युद्ध प्रणाली के रूप में अभ्यास कर रहा है।
यही पहलू भारत सहित उन देशों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है जो भविष्य में चीनी वायु शक्ति का सामना कर सकते हैं।
फ्रांस के लिए भी संदेश
इस घटनाक्रम को फ्रांस के लिए सीधे ‘झटका’ कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। बल्कि राफेल का चीनी टैंकर से सफलतापूर्वक र्इंधन लेना उसकी मानक ‘प्रोब एंड ड्रोग’ रिफ्यूलिंग प्रणाली की इंटरऑपरेबिलिटी भी दर्शाता है। लेकिन चीन को राफेल के साथ लगातार प्रत्यक्ष प्रशिक्षण अनुभव मिलना फ्रांस और राफेल ऑपरेटर देशों के लिए रणनीतिक अध्ययन का विषय जरूर बनेगा।
असल संदेश शायद राफेल से भी बड़ा है-चीन अब अपनी वायुसेना को अपने आसपास के क्षेत्र तक सीमित रखने के बजाय हजारों किलोमीटर दूर संगठित लड़ाकू शक्ति के रूप में तैनात करने की क्षमता प्रदर्शित कर रहा है।
