-कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत में एक बार फिर कमरतोड़ महंगाई का खतरा बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड१०० डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ रहा है और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है।
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में महंगा तेल केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर सब्जियों, फल, दूध, अनाज और रोजमर्रा के सामान तक पहुंचता है। विमान र्इंधन, प्लास्टिक, रसायन और औद्योगिक उत्पादन भी महंगे हो सकते हैं। कच्चे तेल की महंगाई केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहती। परिवहन खर्च बढ़ने से सब्जी, फल, दूध, अनाज और रोजमर्रा की वस्तुओं की ढुलाई महंगी होती है। विमान र्इंधन, प्लास्टिक, पेंट, रसायन और औद्योगिक उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है। यानी तेल का हर डॉलर अंतत: आम आदमी की जेब तक पहुंचता है।
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है
एक तरफ वैश्विक तेल संकट, दूसरी तरफ घरेलू महंगाई को काबू में रखना। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक त्र्१०० के आसपास टिक गया तो पेट्रोल-डीजल पर कर घटाने का दबाव भी बढ़ सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वैश्विक बाजार में तेल महंगा हो रहा है, तब आम आदमी को राहत देने के लिए सरकार क्या करेगी? क्या पेट्रोल-डीजल पर करों में कमी होगी या बढ़ी लागत का पूरा बोझ जनता की जेब पर डाला जाएगा? महंगाई पहले ही घरेलू बजट को दबा रही है। अब कच्चे तेल का उबाल नई मुश्किल लेकर खड़ा है।
