महाराष्ट्र सरकार खुमारी और नशे से जाग गई है और उसने २०२९ तक राज्य को नशामुक्त करने का एलान कर दिया है। अगर राज्य सरकार ने नशीले पदार्थों के संपूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य रखा है, तो यह सराहनीय है। फिलहाल, नशीले पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई मुख्य रूप से पुलिस और गृह विभाग के जरिए होती है। लेकिन इस कार्रवाई में `नशामुक्ति’ के नाम पर पुलिस और इस क्षेत्र में काम करने वाली केंद्रीय टीमें ही `गब्बर’ बन जाती हैं, यह बार-बार उजागर हुआ है। नशे की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण, युवा, महिला एवं बाल विकास जैसे तमाम विभागों से जुड़ी यह समस्या है। इसीलिए नशामुक्ति के लिए सरकार के सभी विभागों द्वारा मिलकर काम करने की नीति राज्य सरकार ने अपनाई है, ऐसा कहा जा रहा है। सरकार ने यह घोषणा पूरी तरह होश में रहकर की होगी, तो यह नशामुक्ति के लिए प्रेरणादायक साबित होगी। `जंतर-मंतर’ पर युवाओं के आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने आधी रात को सोशल मीडिया पर आकर जो `रील्स’ बनाई थीं, उसमें उन्होंने `ड्रग्स’ विरोधी अभियान और नशामुक्ति आदि पर टिप्पणी की थी। क्या इसका मतलब यह है कि जंतर-मंतर पर युवा आंदोलनकारी नशे में धुत होकर आंदोलन में उतरे थे? इसलिए सरकार को लगा कि देश में नशामुक्ति का अभियान चलाना चाहिए? मूल रूप से
`नशा’ सिर्फ
चरस, अफीम, गांजा, ब्राउन शुगर वगैरह नशीले पदार्थों का होता है। इन नशीले पदार्थों के अलावा अन्य तरीकों से भी आजकल नशा किया जाता है। ऊपर से यह नशा स्कूल-कॉलेज के दरवाजों तक पहुंच चुका है और बच्चों को यह नशा आसानी से उपलब्ध हो रहा है, तो यह सारा माल बिना किसी बाधा के महाराष्ट्र तक पहुंचता वैâसे है? नासिक और पुणे में तो नशीले पदार्थ बनाने के कारखाने ही बीच में उजागर हुए थे। सातारा में भी नशीले पदार्थों का कारखाना मिला था। यह कारखाना किसकी जमीन पर था? वह पूरा मामला बाद में गृह मंत्री फडणवीस ने ही दबा दिया। नासिक में मैंड्रेक्स की नशीली गोलियों का कारखाना किसके कृपा-आशीर्वाद से चलाया जा रहा था, यह राज्य के गृह मंत्री को पता नहीं है तो वे इस महत्वपूर्ण कुर्सी को सेंकते न बैठें, यही बेहतर होगा। महाराष्ट्र `उड़ता महाराष्ट्र’ हो रहा है। नासिक और पुणे इस उड़ते महाराष्ट्र के दो पंख हैं। नासिक-पुणे की जनता ने जब इस नशेबाजी के खिलाफ मोर्चे निकाले, तब बीजेपी के ही लोगों ने मजाक उड़ाया। क्योंकि नशे के इस कारोबार में इन्हीं लोगों के हाथ रंगे हुए हैं। गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आए सैकड़ों करोड़ के `ड्रग्स’ उतरते हैं और महाराष्ट्र समेत पूरे देश में उनका वितरण होता है। मोदी-शाह के गृह राज्य की यह स्थिति है, लेकिन वे
दूसरों को ज्ञानामृत
बांट रहे हैं। मोदी सरकार देश में २०१४ से सत्ता में है। लगभग उतना ही समय महाराष्ट्र में फडणवीस का शासन रहा है। तो फिर महाराष्ट्र के नशे के कारोबार को नेस्तनाबूद करने से उन्हें किसने रोका था? अब कहते हैं कि वे २०२९ तक नशे का समूल उच्चाटन करेंगे। महाराष्ट्र की जनता से हमारी इतनी ही अपील है कि वे उनकी आज की यह तारीख अपनी डायरी में दर्ज करके रखें और २ सितंबर २०२९ को महाराष्ट्र सच में नशामुक्त हुआ क्या? यह सवाल फडणवीस और उनके लोगों से पूछें। मूल रूप से नशे की परिभाषा क्या है, यह सरकार पहले तय करे। `शराब बनाने वाले’ तमाम चीनी मिल मालिक आज बीजेपी के तंबू में शरण लिए हुए हैं। इन शराब सम्राटों को नशे की बिक्री न करने की ताकीद फडणवीस देंगे क्या? या शराब नशीला पदार्थ न होने की घोषणा करने का आदेश तुकाराम मुंढे को देकर वे शराब में सोडा-पानी डालकर स्वाद थोड़ा हल्का करेंगे? बीजेपी एक नंबर की ढोंगी और दिखावटी पार्टी है। इस समय महाराष्ट्र के तमाम नशीले पदार्थों के व्यापारी, शराब निर्माता, सिगार-सिगरेट वाले, भांग-गांजा बेचने वाले बीजेपी के आश्रित हैं। नशे के इसी कारोबार पर बीजेपी वालों की राजनीति की गाड़ी दौड़ती है। वही लोग महाराष्ट्र को `नशामुक्त’ करने निकले हैं। नशा और खुमारी तो भ्रष्टाचार और पैसों की भी होती है। महाराष्ट्र को इस नशे से भी मुक्त कराना होगा!
