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बेबाक : सरकार में कुछ तो गड़बड़ है!..मंत्री से मंत्री भिड़े, सहयोगी से सहयोगी; भाजपा के भीतर भी उठने लगीं अलग-अलग आवाजें

अनिल तिवारी, मुंबई

केंद्र में मोदी सरकार ऊपर से तो मजबूत दिखाई दे सकती है, लेकिन पिछले कुछ सप्ताह की घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो तस्वीर दूसरी कहानी कहती है। कहीं केंद्र सरकार के दो सहयोगी मंत्री एक-दूसरे का इस्तीफा मांगते दिखते हैं तो कहीं भाजपा के दो सांसद पुराने हिसाब चुकता कर रहे होते हैं। कहीं महाराष्ट्र की महायुति के भीतर विभागीय अधिकारों को लेकर नाराजगी दिखती है तो कहीं भाजपा के ही वरिष्ठ नेता सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं। सवाल यह नहीं कि इनमें से हर विवाद सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विद्रोह है। सवाल यह है कि जिस भाजपा और एनडीए की सबसे बड़ी ताकत लंबे समय तक मोदी गुणगान और एक स्वर में बोलना रही, वहां अब असहमति बार-बार बाहर क्यों दिखाई दे रही है?
मुरली मनोहर जोशी की नाराजगी
भाजपा में मार्गदर्शक मंडल के सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी शिक्षा नीति, पेपर लीक, बजट और शासन की प्राथमिकताओं पर तीखे सवाल उठाते हैं। यह आपत्ति विपक्ष से नहीं, भाजपा की उस पुरानी पीढ़ी से है जिसने पार्टी को खड़ा करने में दशकों लगाए हैं। विपक्ष की आलोचना को तो राजनीतिक हमला कहकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन अपने ही बुजुर्ग नेता की चेतावनी को किस खाते में डाला जाए?
मोहन भागवत की अलग लाइन
इधर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी कई मुद्दों पर ऐसी भाषा बोल रहे हैं जो सरकार के कठोर राजनीतिक नैरेटिव से अलग सुनाई देती है। छात्र आंदोलनों पर उन्होंने कहा कि जेन-जी की शिकायतें वास्तविक हैं और आंदोलन भी लोकतांत्रिक संवाद का ही तरीका है। संघ प्रमुख एक साथ कई मोर्चों पर खड़े दिखाई देते हैं, देश के भीतर युवाओं से संवाद की बात और विदेश में आरएसएस की छवि को लेकर उनके समक्ष सवाल हैं तो इसमें काफी हद तक मोदी सरकार की ही नाकामी है।
चिराग-मांझी की खुली जंग
सबसे गंभीर मामला केंद्र सरकार के भीतर ही सामने दिखता है। आरक्षण में उपवर्गीकरण और क्रीमी लेयर के सवाल पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी आमने-सामने हैं। मामला बयानबाजी तक सीमित नहीं, दोनों पक्षों के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया है। यह सामान्य गठबंधन असहमति नहीं है; एक ही सरकार के दो केंद्रीय मंत्रियों का सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे की राजनीतिक वैधता पर सवाल उठाना एनडीए के भीतर बढ़ते दबाव का संकेत है।
गडकरी के बयान और हलचल
धर्मेंद्र प्रधान के बाद सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है नितिन गडकरी। वे भी इसे जान गए हैं, तभी तो वे कहते हैं कि अब वह पहले जैसा काम नहीं कर पाते और नई पीढ़ी को जिम्मेदारी देने का वक्त आ गया है। सब जानते हैं कि ई२० पेट्रोल ने उनका राजनैतिक माइलेज बिगाड़ दिया है। मंत्रिमंडल से छुट्टी के कयासों के बीच इस बयान के अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। भाजपा नेतृत्व का उन पर दबाव है। दबाव शिवराज सिंह चैहान पर भी है।
कंगना-रामदेव का विवाद
कंगना रनौत और बाबा रामदेव के बीच भी तीखा वाक्युद्ध हुआ। दोनों ने एक-दूसरे पर निचले स्तर के कटाक्ष किए। भाजपा की जीत में जिन बाबा रामदेव का बहुत बड़ा हाथ था, उन्हें कंगना ने बुरी तरह बेइज्जत करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा। फिर भी बाबा रामदेव द्वारा राखी और मिठाई भेजने के सकारात्मक कदम के बाद दोनों ने विवाद शांत करने का संकेत दिया। लेकिन यह प्रकरण सत्ता समर्थक सामाजिक-राजनीतिक खेमे के भीतर बढ़ती असहजता का उदाहरण जरूर है।
मनोज तिवारी-रवि किशन भिड़ंत
भाजपा सांसद और भोजपुरी सिनेमा के दो बड़े चेहरे मनोज तिवारी और रवि किशन के बीच पुरानी प्रतिद्वंद्विता फिर सतह पर है। दोनों सार्वजनिक मंच से एक-दूसरे के फिल्मी दावों पर कटाक्ष कर रहे हैं। इसे बड़ी राजनीतिक बगावत नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि भाजपा के भीतर व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विताएं अब पहले जैसी पर्दे के पीछे नहीं रह गर्इं।
महायुति में सब सहज नहीं
महाराष्ट्र में भाजपा और एकनाथ शिंदे के बीच विभागीय अधिकारों को लेकर नाराजगी खुलकर सामने आ चुकी है। शिंदे गुट के मंत्रियों ने मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा उनके विभागों में हस्तक्षेप की शिकायत की है। शिंदे गुट समय-समय पर विभागीय अधिकार, प्रशासनिक हस्तक्षेप और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर भाजपा से असहज दिखाई देता रहा है। मतलब साफ है, महायुति चल रही है, लेकिन बेहद तनाव में।
राजस्थान-मध्य प्रदेश भी बेचैन
राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के टिकट वितरण को लेकर भाजपा में असंतोष, विरोध और दल-बदल की खबरें सामने आई हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए यह संगठनात्मक चुनौती है। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार से जुड़े जमीन सौदों के आरोपों ने उनकी राजनीतिक परेशानी बढ़ा दी है। मामला इतना गंभीर है कि इसे राज्य की राजनीति में उनके लिए महत्वपूर्ण चुनौती माना जा रहा है। लिहाजा दोनों राज्यों में कार्यकर्ता बेलगाम हैं।
हर ओर भाजपा बनाम भाजपा
भाजपा के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले गुजरात में भी स्थानीय गुटबाजी सामने है। वडोदरा के डभोई इलाके में भाजपा के दो स्थानीय गुटों का विवाद सोशल मीडिया से निकलकर सड़क पर मारपीट और क्रॉस एफआईआर तक पहुंच गया। कमोवेश पूरे देश में पार्टी का यही हाल है। हर स्तर पर पार्टी के भीतर गुटबाजी की गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता।
सुभाष चंद्रा बनाम मुकेश अंबानी
कारोबारी दुनिया में भी असाधारण टकराव सामने आया है। एस्सेल समूह के सुभाष चंद्रा ने मुकेश अंबानी और उनके मीडिया नेटवर्क पर गंभीर आरोप लगाए हैं। रिलायंस ने आरोपों को खारिज किया है। २२ हजार करोड़ से जुड़े चंद्रा के दिवालिया समाधान विवाद के बीच यह कारोबारी लड़ाई अब सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों उद्योगिक घरानों की मोदी और भाजपा से काफी नजदीकी है।
‘आयरन कंट्रोल’ ढीला पड़ा?
प्रधानमंत्री मोदी के बारे में ‘देश से भाग रहे हैं।’ इसी तरह अमित शाह के संसद से ‘भागने’ का चित्र पूरा देश देख चुका है। वे संसद परिसर में नियमित मौजूद रहते हैं पर सदन में नहीं जाते। इन सभी घटनाओं को मोदी सरकार में गड़बड़ी की कड़ी माना जा सकता है। मनोज-रवि की प्रतिद्वंद्विता और चिराग-मांझी का आरक्षण विवाद सहज मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
महाराष्ट्र की गठबंधन राजनीति और गुजरात की स्थानीय गुटबाजी भी अलग प्रकृति की घटनाएं हैं। लेकिन जब इतनी सारी असहमतियां एक ही समय में सतह पर दिखने लगें तो राजनीतिक संकेत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
एक दशक तक भाजपा की सबसे बड़ी पहचान थी, ऊपर फैसला, नीचे आदेश और बाहर एक आवाज।
अब तस्वीर में कई आवाजें हैं
सहयोगी बोल रहे हैं। मंत्री भिड़ रहे हैं। राज्यों में गुट खुल रहे हैं। पुराने नेता सवाल पूछ रहे हैं। संघ प्रमुख अलग राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। इसलिए सवाल यह है कि मोदी सरकार अब कब तक? जिस सत्ता की ताकत उसका अभेद्य अनुशासन था, क्या अब उसी दीवार में अलग-अलग जगह दरारें नहीं दिखाई देने लगी हैं?
सहयोगी दल ‘साथ’ नहीं
एनडीए के भीतर बदलती राजनीति का एक बड़ा संकेत सहयोगी दलों के रवैये में दिखाई दे रहा है। छोटे और क्षेत्रीय दल अब सिर्फ सरकार को समर्थन देने तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे फैसलों में हिस्सेदारी, अपने सामाजिक आधार से जुड़े मुद्दों पर स्वतंत्र रुख और सत्ता में सम्मानजनक अधिकार की मांग कर रहे हैं। गठबंधन की राजनीति में अब यह संदेश साफ है कि सहयोगी दल केवल संख्या देने वाले साझेदार नहीं रहना चाहते। यह स्थिति भाजपा नेतृत्व के लिए नई चुनौती है। पूर्ण बहुमत वाली सरकार में सहयोगियों की नाराजगी को नजरअंदाज करना आसान था, लेकिन गठबंधन की मजबूरियों में हर सहयोगी की राजनीतिक कीमत बढ़ जाती है। यही वजह है कि एनडीए के भीतर अब सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि सत्ता, नीति और राजनीतिक प्रतिष्ठा का बंटवारा भी बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

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