के.पी. मलिक
किसी देश को विश्व शक्ति बनाने के लिए धर्म का डंका पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए विज्ञान चाहिए, तकनीक चाहिए, उच्चस्तरीय उत्पादन चाहिए, वैश्विक बाजार में अपनी शर्तों पर मुकाबला करने की क्षमता चाहिए और सबसे बढ़कर ऐसी आर्थिक व्यवस्था चाहिए जिसमें देश केवल दुनिया का बाजार न बने, बल्कि दुनिया के लिए उत्पाद और तकनीक बनाने वाला राष्ट्र बने। भारत में आज जिस राष्ट्रवाद का सबसे अधिक शोर सुनाई देता है, उसमें धर्म और भावनाएं तो खूब हैं, लेकिन आर्थिक राष्ट्रवाद, तकनीकी आत्मनिर्भरता और उच्च मूल्य वाले उत्पादन की चर्चा अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। यही वह बिंदु है जहां भारत के विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़ा होता है।
लफ्फाजी
चीन के साथ भारत का व्यापार इसका एक बड़ा उदाहरण है। भारत चीन से भारी मात्रा में मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, औद्योगिक सामान और दूसरे इनपुट आयात करता है। इसके मुकाबले हमारा निर्यात बहुत कम है और व्यापार घाटा लगातार बड़ा बना हुआ है। समस्या केवल इतनी नहीं कि हम चीन से ज्यादा खरीदते हैं। असली समस्या यह है कि हमारी उत्पादन व्यवस्था के कई हिस्से अब भी चीनी आपूर्ति-श्रृंखला पर निर्भर हैं। यदि विदेश से कच्चा माल, कंपोनेंट और तकनीक लेकर भारत में उसकी असेंबली या पैकेजिंग की जाए और फिर उसे `भारत का निर्यात’ कहकर उपलब्धि का ढोल पीटा जाए, तो आंकड़ों में टर्नओवर जरूर बढ़ सकता है, लेकिन देश के भीतर पैदा होने वाला वास्तविक आर्थिक मूल्य सीमित रह सकता है। आर्थिक शक्ति का असली पैमाना यह नहीं कि किसी देश ने कितने अरब डॉलर का माल निर्यात किया। सवाल यह है कि उस माल में उस देश की अपनी तकनीक, डिजाइन, बौद्धिक संपदा, मशीनरी और वास्तविक वैल्यू-एडिशन कितनी है। दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों ने केवल सामान खरीदकर और पैक करके अपनी संपत्ति नहीं बनाई।
अमेरिका ने तकनीकी कंपनियां और बौद्धिक संपदा पैदा की, जर्मनी ने इंजीनियरिंग और मशीनरी में नेतृत्व हासिल किया, जापान ने विनिर्माण और गुणवत्ता की नई कसौटियां स्थापित कीं, दक्षिण कोरिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और भारी उद्योग में अपनी जगह बनाई और प्रâांस ने विमानन तथा रक्षा तकनीक में वैश्विक क्षमता विकसित की। ये देश इसलिए शक्तिशाली नहीं बने कि उन्होंने खुद को विश्वगुरु घोषित किया; वे इसलिए शक्तिशाली बने क्योंकि दुनिया को उनकी तकनीक और उत्पादों की जरूरत पड़ने लगी।
भारत के सामने भी यही चुनौती है। राफेल जैसे रक्षा सौदों पर राजनीतिक बहस अपनी जगह है, लेकिन उससे कहीं बड़ा सवाल यह है कि हम कब ऐसी क्षमता विकसित करेंगे कि अत्याधुनिक लड़ाकू विमान, इंजन, रडार, एवियोनिक्स और हथियार प्रणालियां खरीदने के बजाय दुनिया को बेच सकें। किसी विमान को विदेश से खरीद लेना सामरिक जरूरत हो सकती है, लेकिन लगातार अत्याधुनिक तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना दीर्घकालीन आर्थिक और सामरिक शक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल किसी विदेशी उत्पाद को भारत में जोड़कर उस पर `मेड इन इंडिया’ लिख देना नहीं है; आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि उसके पीछे की तकनीक, डिजाइन, कौशल, अनुसंधान और अधिकतम संभव वैल्यू-एडिशन भारत के पास हो।
वोट बैंक
यही बात कृषि पर भी लागू होती है। किसान देश की अर्थव्यवस्था के लिए उत्पादन करता है, लेकिन अक्सर अपनी ही उपज की कीमत तय करने की शक्ति उसके पास नहीं होती। फसल बाजार में आती है तो कीमत गिर जाती है और किसान मजबूरी में बेचता है। उसके बाद वही उत्पाद भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन और वितरण की विभिन्न परतों से गुजरते हुए उपभोक्ता तक महंगा होकर पहुंचता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा जोखिम उठाने वाला किसान अक्सर सबसे कम हिस्सेदारी लेकर रह जाता है, जबकि पूंजी, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार पर नियंत्रण रखने वाले बड़े कारोबारी अधिक मूल्य हासिल करने की स्थिति में आ जाते हैं। समस्या उद्योग या कॉरपोरेट के अस्तित्व में नहीं है; समस्या उस आर्थिक संरचना में है जिसमें उत्पादन करने वाले और मूल्य तय करने वाले के बीच शक्ति का इतना बड़ा अंतर पैदा हो जाए कि किसान अपनी ही मेहनत का उचित मूल्य पाने के लिए व्यवस्था का मुंह ताकता रहे।
भारत को ऐसे आर्थिक राष्ट्रवाद की जरूरत है, जो किसान को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि वैल्यू-चेन का वास्तविक भागीदार बनाए; जो छोटे उद्योग को केवल भाषणों में ‘श्एश्E’ न कहे, बल्कि उसे तकनीक, पूंजी और बाजार उपलब्ध कराए; जो बड़े उद्योगों को दुश्मन नहीं माने, लेकिन उनसे पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और रोजगार सृजन की जवाबदेही भी मांगे; और जो विदेशी आयात को केवल राष्ट्रवादी नारों से नहीं, बल्कि घरेलू तकनीकी क्षमता और प्रतिस्पर्धी उत्पादन से चुनौती दे।
दुर्भाग्य यह है कि जब अर्थव्यवस्था के कठिन सवाल सामने आते हैं तो जनता को अक्सर भावनात्मक मुद्दों की ओर मोड़ना राजनीतिक रूप से आसान समझा जाता है। महंगाई पर सवाल हो तो धर्म की बात, बेरोजगारी पर सवाल हो तो राष्ट्रवाद की बात, किसान की आय पर सवाल हो तो संस्कृति की बात, चीन से व्यापार घाटे पर सवाल हो तो देशभक्ति की परीक्षा और तकनीकी पिछड़ेपन पर सवाल हो तो विश्वगुरु होने का दावा।
लेकिन अर्थव्यवस्था नारों से नहीं चलती। उDझ् भाषणों से नहीं बढ़ती, उत्पादकता से बढ़ती है। रोजगार धार्मिक भावनाओं से नहीं पैदा होता, उद्योग और निवेश से पैदा होता है। निर्यात राष्ट्रवादी नारों से नहीं बढ़ता, विश्वस्तरीय उत्पाद और तकनीक से बढ़ता है।
राष्ट्रवाद की परिभाषा
यहीं धर्म आधारित राष्ट्रवाद और आर्थिक राष्ट्रवाद का अंतर सामने आता है। धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है और उसे सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन किसी देश की आर्थिक शक्ति का विकल्प धर्म नहीं हो सकता। कोई धार्मिक नारा सेमीकंडक्टर नहीं बनाता, कोई राजनीतिक भाषण विमान का इंजन नहीं बनाता, कोई सांस्कृतिक गौरव अत्याधुनिक दवा की खोज नहीं करता और कोई धार्मिक ध्रुवीकरण वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पाद की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता नहीं बढ़ाता। इसके लिए वैज्ञानिक सोच, शिक्षा, अनुसंधान, निवेश, कुशल मानव संसाधन और मजबूत संस्थाओं की जरूरत होती है।
भारत को यह समझना होगा कि उसकी वास्तविक प्रतियोगिता किसी धर्म या समुदाय से नहीं है। उसकी प्रतियोगिता उन देशों से है जिन्होंने शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और उत्पादन को राष्ट्रीय शक्ति का आधार बनाया। यदि भारत सचमुच विश्व शक्ति बनना चाहता है तो उसे धार्मिक श्रेष्ठता के दावों से आगे बढ़कर तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करनी होगी। दुनिया को यह बताने से अधिक जरूरी है कि भारत विश्वगुरु है, दुनिया को ऐसा उत्पाद और तकनीक देना जरूरी है जिसके बिना दुनिया का काम न चले।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब आर्थिक विकास का अर्थ केवल कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों की संपत्ति में वृद्धि समझ लिया जाए। उद्योगपति अमीर हों, यह अपने आप में समस्या नहीं है। मजबूत उद्योग किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। समस्या तब शुरू होती है, जब पूंजी और सत्ता का गठजोड़ इतना शक्तिशाली हो जाए कि नीति निर्माण, बाजार और संसाधनों पर प्रभाव कुछ हाथों में केंद्रित होने लगे और दूसरी तरफ किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और आम उपभोक्ता आर्थिक असुरक्षा से जूझते रहें। किसी देश के कुछ नागरिकों का दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल होना गर्व की बात हो सकती है, लेकिन उससे भी बड़ी उपलब्धि तब होगी जब करोड़ों आम नागरिकों की आय, क्रयशक्ति और जीवन स्तर ऊपर उठे।
इसलिए भारत को तय करना होगा कि उसे धर्म के डंके से विश्वगुरु बनना है या आर्थिक और तकनीकी क्षमता से विश्व शक्ति। यदि लक्ष्य वास्तव में विश्व शक्ति बनना है तो सरकार को भावनाओं की राजनीति से ज्यादा प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, कारखानों, स्टार्टअप, पेटेंट, मशीन निर्माण, रक्षा अनुसंधान, सेमाकंडक्टर, मेडिकल टेक्नोलॉजी और उच्च मूल्य वाले विनिर्माण पर ध्यान देना होगा। किसान को बाजार में बेहतर हिस्सेदारी देनी होगी, छोटे उद्योगों को बड़ी आपूर्ति-श्रृंखला से जोड़ना होगा और बड़े कॉरपोरेट को भी प्रतिस्पर्धा तथा जवाबदेही के दायरे में रखना होगा।
क्योंकि दुनिया उन देशों को महान नहीं मानती जो रोज खुद को महान बताते हैं। दुनिया उन देशों के सामने झुकती है, जिनकी तकनीक की जरूरत होती है, जिनकी मशीनें खरीदी जाती हैं, जिनकी दवाइयां जीवन बचाती हैं, जिनके विमान आसमान में उड़ते हैं और जिनके उत्पाद वैश्विक बाजार की दिशा तय करते हैं। धर्म से भीड़ जुटाई जा सकती है, सत्ता हासिल की जा सकती है और भावनाएं भड़काई जा सकती हैं; लेकिन विश्व शक्ति बनने के लिए विज्ञान, तकनीक, उत्पादन और आर्थिक न्याय चाहिए। भारत को अब यह फैसला करना ही होगा कि वह नारों का विश्वगुरु बनेगा या उत्पादन का विश्व नेता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
