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आत्मनिर्भरता के दावे, ब्राजील की चीनी आए!… त्योहारों से पहले मोदी सरकार ने पैदा किया ‘मीठा’ संकट

उमन गुप्ता
नरेंद्र मोदी सरकार के आत्मनिर्भरता के दावे की एक बार फिर हवा निकल गई है। एन त्योहारों के मौके पर चीनी के दाम जब आसामान छूने लगे तो सरकार ने १० लाख टन चीनी आयात का दरवाजा खोल दिया।
एक समय भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक और सामान्यतः निर्यातक देशों में गिना जाता था। फिर भी त्योहारों से पहले घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार को १० लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देनी पड़ी है। खास बात यह है कि इस कोटे के तहत अब तक करीब ८ लाख टन आयात के आवेदन आ चुके हैं और करीब एक दशक बाद भारत ब्राजील से चीनी मंगा रहा है।
सवाल सीधा है कि देश में गन्ना है, चीनी मिलें हैं, किसान हैं और उत्पादन का विशाल तंत्र है, फिर त्योहार आते ही ब्राजील की चीनी क्यों चाहिए? सरकार के मुताबिक पिछले महीने चीनी की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थी। हाल के दिनों में कीमतों में कुछ नरमी जरूर आई है, लेकिन वे अभी भी दो महीने पहले के मुकाबले करीब २०ज्ञ् ऊपर हैं। खाद्य मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार कीमतों में उछाल सिर्फ मांग बढ़ने से नहीं, बल्कि स्टॉक जमा करने यानी होर्डिंग की आशंका से भी जुड़ा था। त्योहारी मौसम में अगस्त से नवंबर के बीच चीनी की मांग सामान्यतः बढ़ती है। गणेशोत्सव, दशहरा और दीपावली में मिठाइयों और कन्फेक्शनरी की खपत बढ़ने से सरकार को बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने की चुनौती है।
१० लाख टन आयात, लेकिन बाजार में कितना पहुंचेगा?
सरकार ने भले ही १० लाख टन शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी हो, लेकिन घरेलू कीमतों में गिरावट के बाद विदेश से चीनी मंगाना आयातकों के लिए पहले जितना आकर्षक नहीं रह गया है। दूसरी ओर, बंदरगाह आधारित रिफाइनरियों ने लगभग २.५ लाख टन रिफाइंड चीनी घरेलू बाजार में बेचने के लिए कोटा मांगा है।
यानी सरकार का बड़ा सवाल अब यह है कि आयात की घोषणा और वास्तविक बाजार आपूर्ति के बीच कितना अंतर रहेगा। अगर आयातित चीनी बाजार में बड़ी मात्रा में आती है तो घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। इससे उपभोक्ता को राहत मिल सकती है, लेकिन चीनी मिलों की बिक्री और किसानों के भुगतान पर इसके असर को भी देखना होगा। सरकार का तर्क है कि उपभोक्ताओं को त्योहारों में महंगी चीनी से बचाना जरूरी है। लेकिन किसान पूछ सकता है। जब घरेलू बाजार में कीमत बढ़ती है तो आयात, और जब कीमत घटती है तो उसका नुकसान किसे?

सिर्फ चीनी नहीं, पूरी कृषि नीति का सवाल
सरकार अब चीनी मिलों से मासिक उत्पादन और बिक्री का सटीक आंकड़ा देने को कह रही है, ताकि बाजार और नीति पर बेहतर निगरानी रखी जा सके। यही कदम एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है। अगर उत्पादन और बिक्री का नियमित डेटा पहले से उपलब्ध था तो बाजार में रिकॉर्ड कीमतें बनने से पहले सरकार को स्थिति का अंदाजा क्यों नहीं हुआ?

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