चिप्स, बिस्किट, नमकीन, शीतल पेय से इंस्टेंट फूड तक पर खतरे की घंटी
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद उद्योग में बेचैनी, पैकेट पर चेतावनी लगी तो बिक्री बचेगी या कंपनियों को बदलनी पड़ेगी रेसिपी
कंपनियों का कहना है कि कोई व्यक्ति एक साथ १०० ग्राम बिस्किट, नमकीन या सॉस नहीं खाता, इसलिए उसी पैमाने पर चेतावनी लगाना उपभोक्ता को भ्रमित कर सकता है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का जवाब है कि ‘छोटी सर्विंग’ दिखाकर अस्वास्थ्यकर उत्पादों को चेतावनी से बचने का रास्ता नहीं मिलना चाहिए।
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
देश के पैकेटबंद खाद्य उद्योग के सामने अब शायद सबसे बड़ी चुनौती स्वाद की नहीं, बल्कि पैकेट के सामने लगने वाले एक छोटे से लाल निशान की है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त पूछताछ के बाद खाद्य सुरक्षा नियामक जिस चेतावनी व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, वह भारत के १०० अरब डॉलर से अधिक के खाद्य और पेय बाजार की पूरी कारोबारी रणनीति बदल सकती है।
अगर प्रस्तावित लाल षट्कोण चेतावनी बड़े पैमाने पर लागू हुई, तो चिप्स, नमकीन, बिस्किट, मीठे पेय, चॉकलेट, इंस्टेंट नूडल्स और अनेक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर ‘अधिक चीनी’, ‘अधिक नमक’ या ‘अधिक संतृप्त वसा’ जैसी चेतावनियां सामने दिख सकती हैं। इसका सीधा असर ग्राहक के खरीद निर्णय पर पड़ सकता है। उद्योग की चिंता भी यही है। खाद्य कंपनियों का तर्क है कि तय सीमाएं बहुत कड़ी हुईं तो बड़ी संख्या में भारतीय उत्पाद लाल निशान के दायरे में आ सकते हैं और देशी खाद्य पदार्थों की छवि तथा बिक्री दोनों प्रभावित हो सकती हैं। यही कारण है कि उद्योग प्रति १०० ग्राम के बजाय ‘एक बार में खाई जाने वाली मात्रा’ के आधार पर पोषण का आकलन चाहता है।
लाल निशान लागू हुआ तो कंपनियों के सामने तीन विकल्प
चेतावनी के साथ उत्पाद बेचें, पैकेट और विज्ञापन की रणनीति बदलें, या चीनी, नमक और वसा कम करके उत्पाद की नई संरचना तैयार करें
इस लड़ाई का सबसे संवेदनशील पहलू बच्चे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान खास तौर पर बच्चों में अस्वास्थ्यकर स्नैक्स की बढ़ती खपत और स्वास्थ्य पर उसके असर का मुद्दा उठाया था। अदालत ने नियामक से पूछा था कि उपभोक्ता, विशेषकर बच्चे, पैकेट उठाते ही यह क्यों न जान सकें कि उसमें चीनी, नमक या वसा बहुत अधिक है। लाल निशान लागू हुआ तो कंपनियों के सामने तीन रास्ते होंगे या तो चेतावनी के साथ उत्पाद बेचें, पैकेट और विज्ञापन की रणनीति बदलें, या चीनी, नमक और वसा कम करके उत्पाद की नई संरचना तैयार करें। यानी यह केवल लेबल बदलने का मामला नहीं, करोड़ों ग्राहकों की पसंद और अरबों रुपए की बिक्री से जुड़ा कारोबारी झटका बन सकता है। भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर पहले ही अभूतपूर्व अभियान चल रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक , हर साल जांचे जाने वाले नमूनों में करीब पांचवां हिस्सा असुरक्षित, घटिया या गलत लेबल वाला पाया जाता रहा है और हाल के वर्षों में हजारों खाद्य लाइसेंस रद्द हुए हैं। अब लड़ाई पैकेट के पिछले हिस्से में छपे छोटे अक्षरों से निकलकर सामने आने वाली है।
’लाल’ निशान छोटा होगा, लेकिन उसका असर उपभोक्ता की थाली से लेकर देश की सबसे बड़ी खाद्य कंपनियों के मुनाफे तक दिखाई दे सकता है।
