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ऐसा है मोदी का विकास!

प्रधानमंत्री मोदी एक तरफ जीडीपी में रिकॉर्ड ७.८ प्रतिशत की वृद्धि का दावा ठोक रहे हैं और दूसरी तरफ देश का शेयर बाजार आए दिन ढह रहा है। निवेशकों के लाखों करोड़ रुपए डूब रहे हैं। बुधवार (९ सितंबर) को सेंसेक्स ७५ हजार के नीचे चला गया। लगातार तीसरे सत्र में यह गिरावट जारी रही। नतीजतन, प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए और निवेशकों को पूरे चार लाख करोड़ का झटका लगा। सेंसेक्स के साथ-साथ निफ्टी ने भी बुधवार को पिछले तीन महीनों का निचला स्तर छू लिया था। जीडीपी वृद्धि का ढोल पीटनेवाली सरकार अब शेयर बाजार की इस गिरावट के लिए फिर से भड़की अमेरिका-ईरान जंग और उससे उछले कच्चे तेल के दामों की तरफ उंगली उठाएगी। क्रूड ऑयल की कीमतें १०० डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं। कहा जा रहा है कि इसका और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड मार्वेâट में आई बिकवाली की लहर का असर हमारे शेयर बाजार पर पड़ा है। इसमें सच्चाई हो भी सकती है, लेकिन यह तो तात्कालिक कारण हुआ। सवाल उस गिरावट का है, जो पिछले कुछ दिनों से शेयर बाजार में लगातार बनी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जीडीपी वृद्धि का ढोल बजाने के बाद तो भारतीय शेयर बाजार में तेजी आनी चाहिए थी। हालांकि,
गिरावट की रफ्तार
और विदेशी निवेशकों द्वारा पैसा निकालने की होड़ बढ़ गई है। ३१ अगस्त को जीडीपी का ‘आंकड़ा’ जारी किया गया। इसके मुताबिक, भारत की जीडीपी में ७.८ प्रतिशत की वृद्धि का दावा किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश से इस दावे का गुब्बारा फुलाया। मोदी ने शेखी बघारी कि कैसे देश की अर्थव्यवस्था रिजर्व बैंक के अनुमान से भी तेज रफ्तार से उछाल मार रही है, लेकिन फिर यह उछाल भारत के शेयर बाजार में आज तक क्यों नहीं दिखा? हकीकत में तो उसी पल शेयर बाजार को खुशी से झूम उठना चाहिए था। प्रधानमंत्री मोदी को सिर-आंखों पर बिठाकर निवेशकों में ‘तेजी’ की हवा भर देनी चाहिए थी। मगर वैसा कुछ भी नहीं हुआ। १ सितंबर को शेयर बाजार ‘स्थिर’ रहा। सरकार के लिए बस यही एक दिलासा था। लेकिन उसके बाद से रोज शेयर बाजार की गिरावट जारी है। विदेशी निवेशकों द्वारा अपना पैसा वापस खींचने का सिलसिला भी नहीं थमा है। बीते महज दस दिनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से छह हजार करोड़ से ज्यादा रुपए निकाल लिए हैं। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के ही आंकड़ों पर गौर करें तो मौजूदा साल में भारतीय शेयर बाजार से
विदेशी निवेशकों
द्वारा निकाली गई पूंजी २.३२ लाख करोड़ के पार पहुंच गई है। यह आंकड़ा २०२५ के मुकाबले लगभग १.६६ लाख करोड़ से भी ज्यादा है। एनएसडीएल के ही आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर के शुरुआती चार दिनों में साढ़े सात हजार करोड़ की विदेशी पूंजी निकाल ली गई। ७.८ प्रतिशत जीडीपी वृद्धि का डंका पीटते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के ‘गतिशील’ होने का दावा किया था। अगर वह सच है तो फिर भारतीय शेयर बाजार की ‘गतिशीलता’ कहां और क्यों गायब हो गई है? विदेशी निवेशक भारत से अपना निवेश निकालने के लिए इतने ‘गतिशील’ क्यों हो गए हैं? ठेकेदारों का हजारों करोड़ का बकाया अब तक चुकता क्यों नहीं हुआ है? मोदी के राज में जीडीपी में ७.८ प्रतिशत की रिकॉर्ड वृद्धि तो होती है, लेकिन न शेयर बाजार ऊपर जाता है, न निवेशकों का मुनाफा बढ़ता है, न महंगाई कम होती है और न ही सरकार की ‘मुफ्त’ अनाज योजना वाले गरीब परिवारों की संख्या घटती है। मोदी जितना जीडीपी वृद्धि का आंकड़ा बढ़ाकर बता रहे हैं, उतना ही शेयर बाजार में आम जनता के नुकसान का, विदेशी निवेशकों द्वारा निकाली गई पूंजी का, महंगाई और मूल्यवृद्धि का आंकड़ा भी फूलता जा रहा है। जीडीपी बढ़ी और भारतीय बाजार ध्वस्त हो गया, फिलहाल देश का यही हाल है। ऐसा है मोदी का विकास!

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