चलो शरीफों बाहर आओ
अपना झंडा स्वयं उठाओ,
बाहर देखो, भीतर देखो।
देख ताककर कदम बढ़ाओ।।
लालच ने धरती खाया है।
इस पर थोड़ी नजर गड़ाओ।।
कुछ विचार को तेज करो तुम।
हम विचार से हाथ मिलाओ।।
भारत मां की पीड़ा समझो।
और जरा आंसू छलकाओ।।
करुणा को क्रोधित होने तक
मन के भीतर आग जलाओ।।
पहले अपना प्रेम दिखाकर।
घर में अमन शांति फैलाओ।।
समझौते से बात बने तो
बढ़िया वातावरण बनाओ।।
हठवादी हो जहां सियासत।
वहां दिमागी दांव लगाओ।
रुकना हो तो थोड़ा रुक कर।
अपनी सारी शक्ति जुटाओ।।
फिर जाकर अच्छे से बोलो।
और वहीं पर शक्ति दिखाओ।।
धीरज औ उत्साह मिलाकर ।।
खुद विवेक का रथ दौड़ाओ ।।
जगे हुए सारे लोगों को।
कह दो थोड़ा जोर लगाओ ।।
खुद विवेक की छतरी ओढ़े।
आगे-आगे बढ़ते जाओ।।
जहां समस्या मार रही है।
उसको जल्दी दूर हटाओ।।
मेहनत और मजूरी करके।
बढ़िया भारत देश बनाओ।।
त्याग तपस्या के बलबूते।
सभी जगह हरियाली लाओ।।
सेवा भावी जीवन जीकर।
हर दुखिया को सुखी बनाओ।।
राम राज्य का सपना लेकर ।
अपना भारत स्वर्ग बनाओ।।
मानवता के महा धर्म को ।
सीने में जल्दी अपनाओ।।
इंसानों की बात करो तुम ।
बाकी सारा धर्म हटाओ।।
खुद के भीतर साईं ढूंढ़ो।।
और कहीं मत दौड़ लगाओ।।
चलो शरीफों बाहर आओ।
अपना झंडा स्वयं उठाओ।।
-हौसिला सिंह अन्वेषी
