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चोरी और सीनाजोरी!

-राम मंदिर का चढ़ावा किसने लूटा? जवाब देने के बजाय महाना बोले, `चंदा दिया है तो रसीद दिखाओ’

-महाना ने सपा विधायकों शाहिद मंजूर और जाहिद बेग का नाम लेते हुए तंज कसा कि अच्छा लग रहा है कि वे भी राम मंदिर की बात कर रहे हैं। इसके बाद उन्होंने कहा, ‘आपने चंदा दिया है तो उसकी रसीद लेकर आइए। जरा देखें कि आपका कितना पैसा चोरी हुआ है।’

-मंदिर का चढ़ावा किसी राजनीतिक दल की निजी तिजोरी नहीं है। वह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी संपत्ति है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना ट्रस्ट तथा शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है।

-रसीद नहीं, इन सवालों का जवाब मांगिए
-पेंशन खाते में अचानक ₹१२.३९ लाख कहां से आए?
-करीब ४० दिनों तक दान पेटियों से चोरी क्यों नहीं पकड़ी गई?
-सीसीटीवी और सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी थी?
-आरोपियों ने किन जिलों में संपत्ति और निवेश किए?
-चोरी हुई पूरी रकम का अंतिम आंकड़ा कब सार्वजनिक होगा?

लखनऊ / अयोध्या
राम मंदिर की दान पेटियों से चढ़ावा चोरी होने की जांच अब आरोपियों के बैंक खातों से लेकर करीब १२ जिलों में उनकी संपत्तियों तक पहुंच चुकी है, लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस गंभीर मामले पर चर्चा कराने के बजाय सवाल पूछने वाले विपक्ष से ही चंदे की रसीद मांगी जा रही है। मंगलवार को विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि चोरी की जांच के लिए भक्त होने का प्रमाण और चंदा देने की रसीद जरूरी है क्या।
विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही समाजवादी पार्टी के विधायकों ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मुद्दा उठाते हुए चर्चा की मांग की। अध्यक्ष ने चर्चा की अनुमति नहीं दी और कहा कि इससे कोई ‘पहाड़ नहीं टूट रहा है।’ नाराज सपा विधायक अपनी सीटों से खड़े हो गए और ‘चढ़ावा चोर, गद्दी छोड़’ के नारे लगाने लगे। मंगलवार की कार्यवाही सपा के विरोध और हंगामे के बीच चली। नारेबाजी से नाराज महाना ने सपा विधायकों शाहिद मंजूर और जाहिद बेग का नाम लेते हुए तंज कसा कि अच्छा लग रहा है कि वे भी राम मंदिर की बात कर रहे हैं। इसके बाद उन्होंने कहा, ‘आपने चंदा दिया है तो उसकी रसीद लेकर आइए। जरा देखें कि आपका कितना पैसा चोरी हुआ है।’
अध्यक्ष का यह बयान इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि मामला कोई राजनीतिक कल्पना नहीं, बल्कि दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारियों और एसआईटी जांच वाला आपराधिक प्रकरण है। पुलिस ने दान पेटियों से प्राप्त नकदी की गिनती में शामिल आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया था। जांच में नकदी, आभूषण और वाहन बरामद होने तथा आरोपियों और उनके रिश्तेदारों से जुड़े दर्जनों बैंक खातों की छानबीन की बात सामने आ चुकी है।
₹४५ हजार की पेंशन, खाते में अचानक ₹१२.३९ लाख
मामले के आरोपी सुभाष श्रीवास्तव के पेंशन खाते में सामान्यत: करीब ४५ हजार रुपए आने की बात कही गई है, लेकिन फरवरी और मार्च के दौरान उसी खाते में अचानक १२,३९,७६० रुपए जमा हुए। खाते में दो फरवरी को पांच लाख रुपए, छह मार्च को पांच लाख रुपए, आठ मार्च को एक लाख रुपए तथा २४ मार्च को ८६,७६० और १,५३,००० रुपए जमा किए गए। अदालत ने २७ जुलाई को २६ जून के बाद खाते में जमा रकम की निकासी पर लगी रोक हटाई थी। जांच अधिकारी ने इस आदेश पर आपत्ति दाखिल की है और मामले की अगली सुनवाई पांच अगस्त को निर्धारित बताई गई है।
अयोध्या से नोएडा तक संपत्तियों की तलाश
पुलिस जांच अब अयोध्या से बाहर करीब १२ जिलों तक पैâल गई है। संबंधित जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर आरोपियों, उनके परिजनों और करीबियों के नाम खरीदी गई जमीन, मकान तथा अन्य निवेश का विवरण मांगा गया है। अयोध्या के अलावा सुलतानपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, बहराइच, गोंडा, बस्ती, लखनऊ, नोएडा, आंबेडकरनगर और बाराबंकी सहित कई जिलों की राजस्व टीमें संपत्तियों का रिकॉर्ड खंगाल रही हैं। जांच एजेंसियों को आशंका है कि चोरी की रकम को रिश्तेदारों के नाम संपत्ति खरीदने या अन्य माध्यमों में निवेश करने में लगाया गया हो सकता है। एसआईटी जांच में पहले ही करीब ४० दिनों में चोरी की लगभग ७० घटनाओं तथा सुरक्षा और सीसीटीवी निगरानी में गंभीर कमियों का उल्लेख सामने आ चुका है। इससे यह मामला किसी एक दिन की मामूली हेरा फेरी नहीं, बल्कि लंबे समय तक चली संगठित चोरी और निगरानी तंत्र की विफलता का संकेत देता है।
`सवाल चंदा देने वाले का नहीं, चढ़ावा बचाने वालों का है’
विधानसभा अध्यक्ष से यह पूछा जाना चाहिए कि सार्वजनिक और धार्मिक महत्व के इतने गंभीर मामले पर सवाल उठाने का अधिकार केवल उसी व्यक्ति को क्यों होगा, जिसके हाथ में दान की रसीद हो? मंदिर का चढ़ावा किसी राजनीतिक दल की निजी तिजोरी नहीं है। वह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी संपत्ति है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना ट्रस्ट तथा शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है। चंदा किसने दिया, कितना दिया और उसकी रसीद कहां है, इन सवालों से असली प्रश्न नहीं बदलता। दान पेटियों तक चोर वैâसे पहुंचे, चोरी लगातार वैâसे होती रही, निगरानी करने वाले क्या कर रहे थे और लूटा गया पूरा पैसा कहां गया? जवाब चोरी पर मांगा गया था, मगर सत्ता पक्ष ने रसीद मांगकर सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। इसे विपक्ष अब सीधे-सीधे ‘चोरी और सीनाजोरी’ बता रहा है।

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