मुख्यपृष्ठस्तंभसिर्फ मुद्रा नहीं अर्थव्यवस्था की चिंता!

सिर्फ मुद्रा नहीं अर्थव्यवस्था की चिंता!

रुपया ९५ प्रति डॉलर के करीब

भारतीय रुपया एक बार फिर ९५ रुपए प्रति डॉलर की मनोवैज्ञानिक सीमा के करीब पहुंच गया है। बुधवार को इसके ९४.७०–९४.७५ के दायरे में खुलने की संभावना जताई गई, जबकि पिछला बंद स्तर ९४.६६ रुपए था। बाजार में ९५ रुपए का स्तर इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक हाल के सप्ताहों में इसी क्षेत्र के आसपास हस्तक्षेप करता दिखाई दिया है।
रुपए की कमजोरी के पीछे केवल घरेलू कारण नहीं हैं। अमेरिका में रोजगार से जुड़े मजबूत आंकड़ों के बाद १० वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड प्रतिफल बढ़कर लगभग ४.४६ प्रतिशत पहुंच गया। इससे अमेरिकी ब्याज दरों में फिर वृद्धि की आशंका बढ़ी और निवेशकों का रुझान डॉलर की ओर हुआ। परिणामस्वरूप भारतीय रुपए सहित कई एशियाई मुद्राओं पर दबाव आया।
दूसरा बड़ा कारण कच्चे तेल की अनिश्चितता है। भारत अपनी आवश्यकता का अधिकांश तेल आयात करता है। अंतर्राष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर भारतीय कंपनियों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं, जिससे रुपए पर अतिरिक्त दबाव बनता है। पश्चिम एशिया का तनाव और अमेरिका-ईरान वार्ता की अनिश्चितता इस जोखिम को बढ़ा रही है। हालांकि, हाल में तेल कीमतों में गिरावट से कुछ राहत भी मिली है। रिजर्व बैंक रुपए की गिरावट को रोकने के लिए सरकारी बैंकों के माध्यम से डॉलर बेचने और फॉरवर्ड बाजार में हस्तक्षेप करने जैसे उपाय अपना रहा है। मई २०२६ में आरबीआई की शुद्ध फॉरवर्ड डॉलर शॉर्ट पोजीशन रिकॉर्ड १०६.६ अरब डॉलर तक पहुंच गई, जो मुद्रा की रक्षा में किए जा रहे बड़े प्रयास को दर्शाती है। लेकिन केवल बाजार में डॉलर बेचकर रुपए को स्थायी रूप से मजबूत नहीं किया जा सकता। इसके लिए निर्यात बढ़ाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, तेल आयात पर निर्भरता घटाना और चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करना जरूरी है। कमजोर रुपया निर्यातकों और विदेश से कमाई करने वालों को लाभ दे सकता है, लेकिन इसका व्यापक असर महंगा आयात, पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची लागत, विदेश में पढ़ाई और यात्रा के बढ़ते खर्च तथा महंगाई के रूप में सामने आता है।

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