मनमोहन सिंह
७० के दशक का वह दौर याद कीजिए, जब ऋषि कपूर नीतू के साथ इसी वन रानी में ‘अमर अकबर एंथोनी’ का हिट सॉन्ग ‘तय्यब अली प्यार का दुश्मन’ गा रहे थे। उस गाने की मस्ती और ‘वन रानी’ की रफ्तार ने इस ट्रेन को देशभर में एक पहचान दे दी थी। लेकिन आज, उसी पटरी पर एक खामोशी पसरी है। ऐसा लगता है, मानो इन खुशियों की गाड़ी को वाकई किसी की नजर लग गई है। लंबे वक्त से यह गाड़ी ठीक-ठाक नहीं चल रही।
उम्मीदों का सफर और तकनीकी ब्रेक
करीब ४३ करोड़ रुपए के भारी-भरकम बजट से इस प्रोजेक्ट का कायाकल्प किया गया था। उम्मीद थी कि नई तकनीक के साथ यह सफर और भी सुहाना होगा, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। १४ मार्च को उद्घाटन के महज दस दिन बाद, यानी २३ मार्च को ही ‘क्लोज्ड मॉडल’ वाली लाल रंग की ट्रेन तकनीकी खराबी के कारण ठप हो गई। तब से लेकर अब तक, कृष्णगिरी स्टेशन पर आने वाले पर्यटकों को केवल निराशा हाथ लग रही है।
प्रशासन का तर्क है कि ट्रेन का डिजाइन बेहद खास और कस्टमाइज्ड है, जिसके कारण इसके मोटर और ब्रेकिंग सिस्टम के पुर्जे बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। वेंडर खोडल कॉर्पोरेशन जेवी के मुताबिक, इन विशिष्ट पार्ट्स को ऑर्डर पर तैयार करवाया जा रहा है, जिसमें उम्मीद से ज्यादा वक्त लग गया। फिलहाल दो में से केवल एक ही ट्रेन ट्रैक पर है, जिससे पर्यटकों की भीड़ को संभालना मुश्किल हो रहा है और बच्चों का लंबा इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
कहा जा रहा है कि २० अप्रैल तक नई अपडेटेड मशीनरी आने के बाद ही वन रानी अपनी पूरी रफ्तार पकड़ पाएगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इतने बड़े निवेश के बाद भी यात्रियों को ऐसी अनिश्चितता का सामना करना उचित है?
‘नजर’ या सिस्टम की सुस्ती?
कहते हैं कि पुरानी यादों को सहेजना मुश्किल होता है, पर जब करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी ‘वन रानी’ पटरियों पर दौड़ने के बजाय शेड में खड़ी रहे, तो सवाल उठना लाजमी है। क्या हमने आधुनिकता के चक्कर में उस सादगी को खो दिया, जो ७० के दशक में ‘तय्यब अली’ के दौर में थी?
पर्यटक उम्मीद कर रहे हैं कि २० अप्रैल को जब यह ट्रेन दोबारा अपनी पूरी क्षमता के साथ चलेगी, तो इसकी सीटी फिर से वही पुरानी खुशियां लेकर आएगी। आखिर ‘वन रानी’ सिर्फ एक ट्रेन नहीं, मुंबई के बचपन का एक हिस्सा है और हम सब चाहते हैं कि इसे लगी यह ‘नजर’ जल्द से जल्द उतर जाए।
तय्यब अली भले ही प्यार के दुश्मन रहे हों, लेकिन आज वक्त की मांग है कि तकनीकी खामियां ‘वन रानी’ की दुश्मन न बनें।
बच्चों की मायूसी और खाली स्टेशन
कृष्णगिरी रेलवे स्टेशन पर आज भी बच्चे अपनी बारी का इंतजार करते दिख जाते हैं, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि दो में से एक ट्रेन (बंद मॉडल वाली लाल वन रानी) खराब खड़ी है, तो उनकी मासूम चमक फीकी पड़ जाती है। पार्क प्रशासन का कहना है कि वेंडर (खोडल कॉर्पोरेशन जेवी) से स्पेयर पार्ट्स आने में देरी हो रही है क्योंकि ये पार्ट्स आम ट्रेनों जैसे नहीं हैं, इन्हें खास तौर पर ऑर्डर देकर बनवाया जा रहा है।
