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सम-सामयिक …सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला… केवल बरी होना पर्याप्त नहीं, मुआवजा भी मिले..!!

शाहिद ए चौधरी

बात मई १९८८ की है- दादर-नागपुर एक्सप्रेस के सेकंड क्लास स्लीपर कोच में एक टीटीई (ट्रेवलिंग टिकट एग्जामिनर) अपनी ड्यूटी कर रहा था कि अचानक सेंट्रल रेलवे की विजिलेंस टीम ने छापा मारकर उस पर आरोप लगाया कि उसने बर्थ आवंटित करने के लिए तीन यात्रियों से रिश्वत ली है, जो कुल ५० रुपए बैठती है और वह एक अन्य यात्री से १८ रुपए का किराया-अंतर लेने में भी नाकाम रहा है। विभागीय जांच के बाद १९९६ में टीटीई को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। उसने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (वैâट) के समक्ष अपने बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी। वैâट ने २००२ में रेलवे को टीटीई की नौकरी बहाल करने का निर्देश दिया। लेकिन उसे अपना जॉब वापस नहीं मिला, क्योंकि सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दस्तक दी, जिसने तुरंत प्रभाव से वैâट के निर्देश पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट में यह मामला १५ वर्ष तक लंबित रहा, जिस दौरान टीटीई की मौत हो गई।
अपूरणीय क्षति!
हाई कोर्ट ने २०१७ में वैâट के आदेश को निरस्त कर दिया और टीटीई की बर्खास्तगी को बरकरार रखा। रिश्वत के आरोप से टीटीई के परिवार की बहुत बदनामी हुई थी। इस कलंक को हटाने के उद्देश्य से टीटीई के परिवार के सदस्यों ने कानूनी संघर्ष को जारी रखने का पैâसला किया। पहले हाई कोर्ट में और फिर सुप्रीम कोर्ट में। जिस साक्ष्य के आधार पर सेवाएं निरस्त की गर्इं थीं, उसकी जांच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जिन तीन यात्रियों से तथाकथित रिश्वत ली गई थी, उनमें से एक से तो पूछताछ की ही नहीं गई और शेष दो ने कहा कि टीटीई ने उनसे रिश्वत की कोई मांग की ही नहीं थी, बल्कि टीटीई ने उन्हें स्पष्ट आश्वासन दिया था कि वह उन्हें रसीद देगा और अन्य कोचों की चेकिंग करने के बाद उन्हें बकाया पैसा लौटा देगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि टीटीई पर जो अन्य आरोप लगाये गए, उनके सिलसिले में भी कोई सबूत नहीं हैं।
अब ३७-वर्ष बाद टीटीई को ५० रुपए रिश्वत लेने के आरोप से बरी किया गया है और वह अपनी बेगुनाही की अच्छी खबर सुनने के लिए जीवित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में पैâसला सुनाते हुए कहा है कि उसके खिलाफ तो कोई मामला बनता ही नहीं था। तीन दशक से भी अधिक पुराने केस को बंद करते हुए न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने आदेश दिया कि पेंशन सहित सभी परिणामी आर्थिक लाभ टीटीई के कानूनी वारिसों को अदा किए जाएं। इस घटना से कुछ बुनियादी सवाल उठने लाजमी हैं। क्या देर से मिले न्याय को इंसाफ कहा जा सकता है? अब जो टीटीई के कानूनी वारिसों को सभी परिणामी आर्थिक लाभ मिलेंगे, क्या उनसे परिवार के ३७-साल के तनाव, तंगी व बदनामी की भरपाई हो जाएगी?
झूठे आरोपों व बर्खास्तगी के बाद तो टीटीई अपने ही खानदान, दोस्तों व समाज की नजरों में गिर गया होगा, क्या उसका कोई मुआवजा है? तनाव व डिप्रेशन में रहने के कारण टीटीई की असमय मौत का दोषी कौन है? उन विजिलेंस अधिकारियों को दोषरहित वैâसे माना जा सकता है, जिन्होंने टीटीई पर झूठे आरोप लगाए और उसकी व उसके परिवार की बर्बादी का कारण बने? उन सरकारी अधिकारियों का क्या जिन्होंने वैâट के आदेश के विरुद्ध बॉम्बे हाई कोर्ट जाने का पैâसला किया? बॉम्बे हाई कोर्ट को टीटीई के निर्दोष होने के वह बिंदु नजर क्यों नहीं आए, जिनका संज्ञान सुप्रीम कोर्ट ने लिया? यह सही है कि न्यायिक व्यवस्था में निचली से उच्चतम अदालतें हैं ही इसलिए ताकि एक जगह अगर चूक हो जाए तो अपील में उसकी भरपाई हो जाए, लेकिन इस व्यवस्था में कहीं कुछ कमी तो अवश्य है कि पैâसले तो सुनाए जाते हैं, मगर आम आदमी को इंसाफ नहीं मिलता। किसी को दोषी ठहरा देना या किसी को बरी कर देना इंसाफ के लिए पर्याप्त नहीं है। जिन लोगों को गलत तरह से दोषी ठहरा दिया जाता है, उनकी अधिकतर मामलों में, भारत क्षतिपूर्ति नहीं करता है। सुप्रीम कोर्ट इसे ऐसी गलती मानता है, जिसे सुधारा जाना चाहिए।
नाइंसाफी!
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह गलत गिरफ्तारी, मुकदमे व दोषसिद्धि का मुआवजा देने के लिए नियम बनाने में सहयोग करे। एक व्यक्ति के गले पर छह वर्ष से फांसी का फंदा लटका हुआ था, उसके खिलाफ पैâसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने उक्त इरादे की घोषणा की। इसका अर्थ यह है कि किसी का बरी हो जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे जो गलत तरीके से सलाखों के पीछे रखा गया या टीटीई की तरह मानसिक पीड़ा व बदनामी से गुजरना पड़ा, उसकी भी भरपाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने निरंतरता के साथ उन लोगों को बरी किया है, जिन्हें निचली अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई थी और निम्नस्तरीय व बेईमानी भरे पुलिस कार्य व मुकदमों पर गुस्सा व दु:ख व्यक्त किया है। निचली अदालतों के गलत पैâसलों की उसने कड़ी आलोचना की है। सुप्रीम कोर्ट का इरादा स्वागत योग्य है, लेकिन उसे मुकम्मल होना ही चाहिए।
हमारी न्यायिक व्यवस्था में जो यह कमी है, उसके एक-एक पहलू पर खूब चर्चा हुई है। विधि आयोग ने २०१८ में इस संदर्भ में सिफारिश की। लोकसभा में इस पर कानून बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन एक सदस्य का निजी बिल, गलत दोषियों के अधिकारों की सुरक्षा विधेयक, २०१९ को गंभीरता से नहीं लिया गया और वह ठंडे बस्ते में चला गया।
बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) में मुआवजा प्रâेमवर्क के लिए गलत गिरफ्तारी, हिरासत व दोषसिद्धि को विधान में शामिल किया जा सकता था, लेकिन इस अवसर को भी गंवा दिया गया। गलत गिरफ्तारी केवल अन्याय नहीं है, बल्कि सम्मान को नष्ट करना है, जीवन को बर्बाद करना है और न्यायिक व्यवस्था पर से विश्वास का उठ जाना है। सवाल यह है कि मुआवजा किस तरह से तय किया जाए? विधि आयोग ने अपनी सिफारिश में कहा था कि मुआवजा तय करने के लिए अपराध की गंभीरता, सजा की सख्ती, हिरासत की अवधि, स्वास्थ्य को नुकसान, बदनामी और हां, आय व अवसरों के खोने का संज्ञान लिया जाना चाहिए। इसमें कानूनी फीस को भी जोड़ा जाए।
अमेरिका से सीखें
न्यूयॉर्क सिटी ने २०१४ में पांच अश्वेत व लातिनी पुरुषों को ४० मिलियन डॉलर मुआवजा दिया था। ये लोग जब अपनी किशोरावस्था में थे तो इन पर गलत आरोप लगाया गया कि सेंट्रल पार्क में इन्होंने एक न्यूयॉर्क के जॉगर पर घातक हमला किया था। अदालत ने १९८९ में इन्हें दोषी घोषित किया, लेकिन २५ साल बाद डीएनए फोरेंसिक के कारण ये बरी हो गए।
अमेरिका की पुनसर््थापन राष्ट्रीय रजिस्ट्री ने २०२३ में १५३ पुनसर््थापन दर्ज किया, जिनमें से ‘लगभग ८४ प्रतिशत अश्वेत थे’ और जिन्होंने ‘सामूहिक रूप से अपने जीवन के २,२३० वर्ष खोये उन अपराधों के लिए, जो उन्होंने कभी किए ही नहीं थे।’ इस संदर्भ में राज्यवार रिकॉर्ड १९८९ से रखना शुरू किया गया और तब से २०२३ तक न्यूयॉर्क स्टेट गलत बंदी बनाने के लिए कुल ३२२ मिलियन डॉलर मुआवजे में दे चुका है। भारत में तो गलत गिरफ्तारी, मुकदमों या दोषसिद्धि का रिकॉर्ड तक नहीं रखा जाता। अगर कभी किसी को मुआवजा मिलता भी है तो बहुत मामूली। इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायणन १९९६ में बरी हुए और ५० लाख रुपए का मुआवजा हासिल करने के लिए उन्हें १० साल लगे। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि राज्य अपने ‘प्रतिस्थानिक दायित्व’ से बच नहीं सकता, लेकिन १९९८ में उसने ही नारायणन को १ लाख रुपए मुआवजे में दिए थे। यहां उम्मीद की जाती है कि टूटने व बिखरने के बाद अगर बरी हो जाओ तो राज्य का एहसान मानो, टीटीई की तरह मरकर भी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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