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सम-सामयिक : नेपाल में मौतों का तांडव … सोशल मीडिया प्रतिबंध ही नहीं और भी हैं वजहें!

नरेंद्र शर्मा
केपी शर्मा ओली सरकार ने फेसबुक, यू-ट्यूब, एक्स सहित २६ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि उन्होंने दी गई एक सप्ताह की अवधि में पंजीकरण नहीं कराया था। जनरेशन जी जेड, जिसका आज के आधुनिक युग में ओढ़ना-बिछौना सोशल मीडिया हो गया है, को नेपाल सरकार की यह अदा पसंद नहीं आई और वह विरोध में हजारों की संख्या में काठमांडू व अन्य शहरों की सड़कों पर उतर आई। प्रदर्शनकारियों ने नेपाल की संसद में प्रवेश करने का भी प्रयास किया और कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि वह संसद में प्रवेश कर गए थे। उग्र भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ी और नतीजतन, नवीनतम सूचनाओं के अनुसार, कम से कम २० लोगों की मौत हो गई और ३०० से अधिक गंभीर रूप से घायल हैं। हालात को नियंत्रित करने के लिए सेना को बुलाना पड़ा है और लगभग १० जगहों पर कर्फ्यू लगाना पड़ा है, जिनमें बानेश्वर, सिंघादरबार, नारायणहिती और संवेदनशील सरकारी क्षेत्र शामिल हैं। जबरदस्त विरोध प्रदर्शन को देखते हुए नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से प्रतिबंध हटा लिया है, लेकिन अभी भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।
तानाशाही रवैया
जनरेशन जेड के बैनर तले हामी नेपाल संगठन द्वारा किए गए इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल एक युवक ने बताया कि उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन कुछ शरारती तत्व (जिनके संभवत: निहित स्वार्थ थे) भीड़ में शामिल होकर उकसाने व भड़काने का काम करने लगे, जिससे प्रदर्शन ने उग्र रूप धारण कर लिया और पुलिस को रबर बुलेट्स व टियरगैस शैल फायर करने पड़े। गौरतलब है कि नेपाल सरकार ने वर्ष २०२४ के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत पिछले माह नोटिस जारी किया था कि सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स २८ अगस्त २०२५ से शुरू होने वाले सप्ताह के भीतर कम्युनिकेशन व इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय में अपना पंजीकरण करा लें, ताकि स्थानीय तौर पर एक संपर्क केंद्र स्थापित हो सके, जिससे अधिकारी शिकायतों को सुनें व उनका समाधान करें। लेकिन मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सऐप), एल्फाबेट (यू-ट्यूब), एक्स (पूर्व में ट्विटर), रेडिट, लिंकडिन आदि २६ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में से एक ने भी सात दिन की अवधि में पंजीकरण नहीं कराया। नतीजतन ४ सितंबर २०२५ को नेपाल सरकार ने इन पर प्रतिबंध लगा दिया।
टिकटॉक, वीबर, निमबज व पोपो लाइव सरकार के साथ पंजीकृत हैं, इसलिए उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया था। टेलीग्राम व ग्लोबल डायरी की अर्जियों पर विचार किया जा रहा है। फिलहाल, टेलीग्राम को एक्सेस नहीं किया जा सकता, क्योंकि सरकार का मानना है कि इस प्लेटफॉर्म का प्रयोग ऑनलाइन फ्राॅड व मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया जा रहा था। पिछले साल टिकटॉक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसे इस साल अगस्त में पंजीकरण के बाद हटाया गया। सोशल मीडिया के आदी हो चुके युवाओं व छात्रों को जब ३-४ दिन इस तरह से खाली बैठना पड़ा कि न रील्स व वीडियो देख पा रहे थे, न किसी को व्हॉट्सऐप कर पा रहे थे और न अपना कंटेंट अपलोड कर पा रहे थे कि कुछ कमाई होती, तो वह जनरेशन जेड के बैनर तले एकत्र हुए और उन्होंने प्रतिबंध के विरुद्ध प्रदर्शन किया, जिसमें हिंसा हो गई। यह ८ सितंबर २०२५ की बात है।
रिपोर्टों के मुताबिक, नेपाल में लगभग १३.५ मिलियन फेसबुक यूजर और तकरीबन ३.६ मिलियन लोग इंस्टाग्राम पर हैं। इनमें से अधिकतर अपने व्यापार के लिए सोशल मीडिया के भरोसे हैं। वह प्रतिबंध का विरोध करने लगे। लेकिन यह विरोध प्रदर्शन जल्द ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन आंदोलन बन गया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नेपाल में भ्रष्टाचार को संस्थागत कर दिया गया है। एक २० वर्षीय छात्रा इक्शामा तुमरोक का कहना था कि वह सरकार के ‘तानाशाही रवैये’ के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं। उनके अनुसार, ‘हम परिवर्तन चाहते हैं। अन्यों ने इन्हें बर्दाश्त कर लिया है, लेकिन हमारी पीढ़ी इस पर विराम लगाएगी… जब नेताओं के बेटों व बेटियों का भविष्य सुनहरा हो रहा है, तो हमारा भविष्य कहां है?’ इसका अर्थ यह हुआ कि मुद्दा केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध का नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार, नेपाल की बद से बदतर होती अर्थव्यवस्था और तानाशाही नेतृत्व का भी है, जिसकी वजह से नेपाल का युवा गुस्से में है।
सावधान नई दिल्ली!
इसमें कोई दो राय नहीं है कि ओली सरकार इस समय अपने कार्यकाल के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। हामी नेपाल ने विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति ली थी और उसने युवाओं से आग्रह किया था कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध की आलोचना करने के लिए एकत्र हों। उनकी विरोध सूची पर व्यापक भ्रष्टाचार के आरोप भी थे। प्रदर्शन उस समय हिंसक हो गया, जब एक समूह जबरन संसद कॉम्प्लेक्स में प्रवेश कर गया, जिसकी वजह से पुलिस से टकराव व फायरिंग हुई। अब ‘नैतिक आधार’ पर नेपाल के गृहमंत्री रमेश लेखक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यहां तीन मुख्य पहलू हैं। एक, पिछले कुछ वर्षों के दौरान नेपाल की गठबंधन सरकारें जो म्यूजिकल चेयर खेल रही हैं, उससे नेपाली समाज में जबरदस्त कुंठा व्याप्त हो गई है। अब बहुत से लोग राजशाही को याद करते हुए संसदीय लोकतंत्र पर ही सवाल उठाने लगे हैं। तीनों मुख्य राजनीतिक पार्टियों- नेपाली कांग्रेस, सीपीएन (यूएमएल) व सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) व उनके महत्वाकांक्षी नेताओं को निरंतरता के साथ केवल अपना उल्लू सीधा करने वालों के रूप में देखा जा रहा है।
इनके नेतृत्व में नेपाल की अर्थव्यवस्था बद से बदतर की तरफ गई है और कोविड महामारी की मार से अभी तक उबर नहीं पाई है। रोजगार व अवसरों के अभाव के कारण जो आग सुलग रही थी, विशेषकर नेपाल के युवाओं में, वह ज्वालामुखी बनने की प्रतीक्षा में थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध से यह ज्वालामुखी फट गया। दूसरा यह कि नेपाल अपने दो पड़ोसियों- भारत व चीन के बीच में सैंडविच बना हुआ है और अति नाजुक संतुलन बनाने की कवायद में लगा हुआ है। इस तथ्य को अनदेखा न किया जा सका कि ओली चीन के उस जश्न में शामिल हुए, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद नहीं थे। यह जश्न दूसरे विश्व युद्ध में चीन की जापान पर विजय के ८० वर्ष होने के उपलक्ष में मनाया गया था। ओली ने भारत व चीन के बीच व्यापार के लिए लिपूलेख के प्रयोग पर भी आपत्ति की, जिस पर नेपाल अपना दावा करता है। ओली के भारत से मतभेद जगजाहिर हैं। नेपाल की मजबूरी यह है कि उसके पास समुद्र का किनारा नहीं है इसलिए उसे व्यापार, प्रेषण व विकास के लिए अपने पड़ोसियों का सहारा लेना पड़ता है और ऐसे में अगर वह किसी एक की तरफ झुकता हुआ प्रतीत होगा तो दूसरा नाराज हो जाएगा।
इस मजबूरी के कारण नेपाल सरकार घरेलू मुद्दों पर अधिक ध्यान नहीं दे पाती है, क्योंकि अधिकतर संसाधन तो विदेश नीति के प्रबंधन में खर्च हो जाते हैं। तीसरा यह कि ओली नेपाली राजनीति में खुद को सख्त नेता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जनरेशन ज़ेड की परेशानियों को पूर्णत: अनदेखा करते हुए, उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को राष्ट्रहित के तौर पर पेश करने का प्रयास किया। इस ‘सख्त नेता’ की छवि ने अतीत में नेपाल का बहुत नुकसान कराया है। यह संभव है कि इस संकट से निकलने के लिए ओली प्रदर्शनकारियों को भारतीय एजेंट्स के रूप में पेश करें। नई दिल्ली को ओली की चालाकियों के लिए तैयार रहना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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