सामना संवाददाता / लखनऊ
उत्तर प्रदेश के शो-विंडो कहे जाने वाले नोएडा में भ्रष्टाचार और भू-माफियाओं के गठजोड़ का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने शासन-प्रशासन की नींव हिला दी है। सेक्टर-११० स्थित महर्षि आश्रम की बेशकीमती जमीन पर भू-माफियाओं के इशारों पर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों ने नियम-कानूनों को ताक पर रखकर २६,००० अवैध फ्लैट और मकान खड़े करवा दिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।
जांच की शुरुआत में ईडी ने निबंधन विभाग के दो सब-रजिस्ट्रार से लंबी पूछताछ की है। इसके बाद अब उन अधिकारियों की बारी है, जो निर्माण के समय अहम पदों पर तैनात थे। ईडी की रडार पर करीब आधा दर्जन पीसीएस अधिकारियों सहित प्राधिकरण के लगभग एक दर्जन अधिकारी हैं।
मानचित्र स्वीकृति के बिना निर्माण
आरोप है कि इन अधिकारियों ने रिश्वत के बदले मानचित्र स्वीकृत किए बिना ही इतने बड़े पैमाने पर निर्माण की अनुमति दी। ईडी अब इन अधिकारियों व उनके करीबियों की आर्थिक कुंडली खंगाल रही है, क्योंकि आशंका है कि भ्रष्टाचार से कमाई गई काली रकम को इन्हीं के जरिए खपाया गया है।
खरीद-फरोक्त में करोड़ों की हेराफेरी
प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी भी इस मामले की समानांतर जांच कर रही है। जांच में सामने आया है कि स्पिरिचुअल रिजनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया ट्रस्ट की लगभग ४० बीघा जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे औने-पौने दामों पर बेचा गया। सर्किल रेट के अनुसार, इस जमीन की कीमत ३३ करोड़ रुपए थी, लेकिन इसे कागजों पर केवल १६ करोड़ रुपए में बेचा गया। हालांकि, ईडी को संदेह है कि इस सौदे की वास्तविक कीमत १०० करोड़ रुपए से अधिक रही होगी। इस हेराफेरी से सरकार को स्टांप ड्यूटी और राजस्व का भारी नुकसान हुआ है।
प्राधिकरण की चुप्पी पर सवाल
ईडी ने नोएडा प्राधिकरण से विशिष्ट खसरा संख्या का विवरण मांगा है। एजेंसी ने पूछा है कि क्या इन जमीनों पर निर्माण की अनुमति दी गई थी? यदि हां, तो इसके लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं? और यदि नहीं, तो प्राधिकरण ने इस विशाल अवैध निर्माण को रोकने के लिए कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर विषय पर जवाब मांगे हुए एक सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन प्राधिकरण की ओर से अब तक कोई उत्तर नहीं दिया गया है।
