एड. कनई बिस्वास
हर बार ऐसा नहीं होता कि एक ही घटना में शामिल सभी लोग बराबर दोषी हों। कभी-कभी हर व्यक्ति की भूमिका अलग होती है और कानून उसी के अनुसार जिम्मेदारी तय करता है।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा ३७, ३८ और ३९ यह स्पष्ट करती हैं कि एक ही घटना में अलग-अलग लोगों की अलग जिम्मेदारी कैसे तय होती है।
केस स्टडी- १: ‘एक घटना, कई लोग- अलग-अलग दोष’ (धारा ३७- अलग-अलग दोष)
तीन लोग मिलकर एक झगड़े में शामिल होते हैं। एक व्यक्ति ने सिर्फ धक्का दिया। दूसरे ने लाठी से हमला किया। तीसरे ने चाकू से गंभीर चोट पहुंचाई।
अदालत क्या देखेगी?
किसने क्या किया?
किसका इरादा और भूमिका क्या थी?
फैसला: पहले व्यक्ति को हल्की सजा, दूसरे को मध्यम सजा, तीसरे को गंभीर सजा। समझें: धारा ३७ के अनुसार, हर व्यक्ति को उसके अपने कार्य के अनुसार सजा मिलेगी
केस स्टडी- २: ‘साझा कार्य, अलग जिम्मेदारी’ (धारा ३८- साझा कार्य, अलग जिम्मेदारी)
दो लोग चोरी करने गए। एक ने सिर्फ दरवाजा खोला। दूसरे ने अंदर जाकर सामान चुराया।
अदालत क्या देखेगी?
दोनों की भूमिका अलग थी लेकिन दोनों शामिल थे। फैसला: दोनों दोषी, लेकिन सजा अलग-अलग हो सकती है। समझें: धारा ३८ कहती है कि एक ही अपराध में शामिल होने पर भी जिम्मेदारी बराबर होना जरूरी नहीं
केस स्टडी- ३: ‘ज्ञान और इरादे का फर्क’ (धारा ३९ – ज्ञान और इरादे का फर्क)
दो लोग मिलकर किसी को डराने गए। एक का इरादा सिर्फ डराने का था दूसरे को पता था कि मामला गंभीर हो सकता है, फिर भी उसने ज्यादा नुकसान पहुंचाया।
अदालत क्या देखेगी?
किसका इरादा क्या था?
किसे संभावित परिणाम का ज्ञान था?
फैसला: दोनों दोषी, लेकिन जिसका इरादा/ज्ञान ज्यादा गंभीर था, उसे ज्यादा सजा। समझें: धारा ३९ के अनुसार, इरादा और ज्ञान के आधार पर सजा तय होती है
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि हर व्यक्ति को उसकी भूमिका के अनुसार सजा मिलेगी। कानून ‘एक ही तराजू’ से सबको नहीं तौलता। इरादा, ज्ञान और भूमिका—तीनों मिलकर तय करते हैं जिम्मेदारी। यही कारण है कि न्याय अधिक सटीक और न्यायसंगत बनता है।
(अगले अंक में: धारा ४०, ४१ और ४२, ‘शब्दों की कानूनी परिभाषाएं (जैसे ‘व्यक्ति’, ‘लोक सेवक’, ‘संपत्ति’)’ को आसान भाषा में समझेंगे।)
