डॉ. अनिता राठौर
एक सरकारी इंटर कॉलेज में अध्यापकों के ९३ पद स्वीकृत हैं, लेकिन वहां फिलहाल ३० अध्यापक ही काम कर रहे हैं यानी ६३ स्थान रिक्त पड़े हैं। नियुक्तियों पर सरकारी पाबंदी की वजह से इन्हें भरा नहीं जा रहा। उनकी जगह पीटीए (पैरेंट्स टीचर्स एसोसिएशन) फंड से युवाओं को मामूली पारिश्रमिक पर रखकर काम चलाया जा रहा है या रिटायर्ड हुए अध्यापकों को १५-२० हजार मासिक देकर वापस बुला लिया जाता है। नई नियुक्तियां इसलिए नहीं हो रहीं कि अध्यापकों का वेतन बहुत अधिक है और राज्य सरकारें अपने खर्चे में वृद्धि नहीं करना चाहतीं। उत्तर प्रदेश में एक लेक्चरर लगभग ७०,००० रुपए के मासिक प्रारंभिक वेतन पर नियुक्त होता है। यह हाल पूरे देश में सिर्फ सरकारी कॉलेजों का ही नहीं है, बल्कि तकरीबन हर सरकारी संस्था का है। केंद्र व राज्यों की संस्थाओं में तकरीबन ८० लाख से अधिक रिक्त स्थान होने का अनुमान है।
अब एक दूसरी तस्वीर देखिये। हाल ही में मध्य प्रदेश की राज्य सरकार ने घोषणा की है कि वह स्थानीय पुलिस में ७,५०० कांस्टेबलों की भर्ती करेगी। दस लाख से अधिक आवेदन आए। इस जॉब के लिए न्यूनतम योग्यता १०वीं कक्षा पास है, लेकिन पीएचडी, इंजीनियर व पोस्ट ग्रेजुएट भी नौकरी पाने की कतार में लगे हुए थे। इससे देश में बेरोजगारी का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। हम जानते हैं कि उच्चतम यूपीएससी सिविल सर्विसेज से लेकर सबसे निचले पायदान के रेलवे पदों तक, भारत में सरकारी नौकरियों के लिए जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है। जहां जॉब्स हैं, वहां खर्च बढ़ने के डर से नियुक्तियां नहीं की जा रहीं और इसलिए जहां भर्ती की कोई मामूली सी भी गुंजाइश निकलती है तो बेरोजगारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने २७ अक्टूबर २०२५ को ८वां वेतन आयोग नोटिफाई किया है।
श्रम बाजार में विषमता!
इस नोटिफिकेशन का अर्थ यह है कि सरकार में जो टॉप जॉब्स में हैं, उनके वेतनों में अतिरिक्त वृद्धि कर दी जाएगी। यही बात सरकारी नौकरियों के आकर्षण को बढ़ाए हुए है। इसी बात से प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी आहत होते हैं, क्योंकि (अगर २-३ प्रतिशत सीईओ स्तर के पदों को छोड़ दिया जाए तो) वे अपने समतुल्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में अधिक काम करने के बावजूद, कम वेतन पाते हैं। हकीकत यह है कि औसत सरकारी जॉब भी औसत भारतीय के लिए भव्य, जीवन को बदलने वाली और लाटरी लगने के समान है। ब्लू-कॉलर जॉब्स पर डाटा तलाश कर पाना कठिन कार्य है। वाइट-कॉलर जॉब्स पर डाटा आसानी से मिल जाता है इसलिए उसकी समीक्षा की जा सकती है। मसलन, बैंकिंग को लें। सरकारी बैंकों में वेतन लगभग सरकारी कर्मचारियों के ही बराबर हैं। वित्तीय वर्ष २०२५ में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रति कर्मचारी का औसत वेतन तकरीबन २७-२८ लाख रुपए था (वार्षिक रिपोर्टों में कुल कर्मचारियों के खर्च प्रावधानों को प्रकाशित डाटा के आधार पर कुल कर्मचारियों की संख्या से भाग देने पर)। अब अगर इसकी तुलना आईसीआईसीआई व एचडीएफसी बैंकों से की जाए तो उनके कर्मचारियों को इसके आधे से भी कम वेतन मिला। सरकारी बैंकों में औसत २०-२८ लाख रुपए सालाना है, जबकि प्राइवेट बैंकों में इससे बहुत कम पैसा मिलता है। जिन अन्य सेक्टर्स में अच्छा डाटा उपलब्ध है, उनमें भी यही ट्रेंड देखने को मिलता है।
भारी भरकम सरकारी वेतन ने श्रम बाजार को विषम कर दिया है। श्रम आधारित भारतीय उद्योगों को पर्याप्त संख्या में अच्छे श्रमिक नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे निर्माण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सूना पड़ गया है। लाखों युवा रेलवे गैंगमैन या पीएसबी क्लर्क बनने की तैयारी में लगे रहते हैं। वह सामाजिक विज्ञान कॉलेज में डिग्री लेने के लिए प्रवेश लेते हैं, जबकि यह शिक्षा एकदम बेकार है अगर सरकारी नौकरी की लॉटरी न लगे तो। राजनीतिशास्त्र या समाजशास्त्र की डिग्री वाले का निर्माण उद्योग में कोई काम ही नहीं है। वह तो डिग्री लेकर भी पुलिस में कांस्टेबल बनने की कोशिश करेगा, जहां केवल १०वीं पास की जरूरत होती है। भारी भरकम सरकारी वेतन से यह भी हुआ है कि भारत के फिस्कल स्थान पर चंद सरकारी बाबुओं का कब्जा है, जबकि जरूरत उनसे भी कम की है।
खजाने पर बोझ!
सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट में भारत व अमेरिका में सरकारी कर्मचारियों की संख्या की तुलना की गई थी। अमेरिका भी भारत की तरह बड़ा देश है और उसका राजनीतिक ढांचा भी संघीय है। भारत में २०१४ में केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की संख्या लगभग १८ लाख थी, जिनमें रेलवे व डाक विभाग के कर्मचारियों को नहीं गिना गया था। अमेरिका में फेडरल कर्मचारियों की संख्या २१ लाख थी। अगर जनसंख्या के हिसाब से एडजस्ट किया जाए तो अंतर जबरदस्त है। भारत में प्रति १,००,००० व्यक्तियों में १३९ केंद्रीय सरकारी कर्मचारी थे, जबकि अमेरिका में ६६८ व्यक्तियों में एक।
भारत का कूटनीतिक कोर मुश्किल से १,००० का है, जबकि अमेरिका, चीन व छोटे-छोटे यूरोपीय देशों में इनकी संख्या हज़ारों में पहुंचती है।
भारी-भरकम सरकारी वेतन से सरकारी कर्मचारियों की उत्पादकता में कोई इजाफा नहीं होता है। वैâलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कार्तिक मुरलीधरन के नेतृत्व में सरकारी स्कूल टीचर्स पर एक शोध किया, जिसका शीर्षक था ‘डबल ओर नथिंग’ (दोगुना या कुछ भी नहीं)। अध्यापकों के एक समूह के वेतनों को दोगुना कर दिया गया और दूसरे नियंत्रित समूह के वेतन में कोई वृद्धि नहीं की गई। नतीजे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दोगुने वेतन लेने के बाद भी अध्यापकों की उपस्थिति या विषय ज्ञान नियंत्रित समूह जैसा ही रहा और छात्रों के परफॉर्मेंस पर भी कोई फर्क नहीं पड़ा। इस महत्वपूर्ण शोध से स्पष्ट हुआ कि सरकारी कर्मचारियों की बिना शर्त वेतन वृद्धि उनकी उत्पादकता में कोई इजाफा नहीं करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की आर्थिक प्रगति को ‘सुधारों’ से गति दी जा सकती है, वह ‘सुधार’ क्या हों, कोई नहीं जानता, सिवाय इसके कि सरकारी बाबुओं के वेतन में इजाफा कर दिया जाये। यह वृद्धि अब इतनी अधिक हो गई है कि राज्य सरकारों को खजाना खाली होने का डर लगा रहता है और वह वहां भी नियुक्तियां करने में संकोच करती हैं, जहां कर्मचारियों की वास्तव में कमी है, जैसे स्कूल।
इसी वजह से तदर्थ अध्यापकों से काम लिया जाने लगा, जो मामूली भत्ते पर बिना जॉब सुरक्षा के काम करते हैं। कुल मिलाकर तथ्य यह है कि प्राइवेट सेक्टर की तुलना में सरकारी सेक्टर में वेतन आवश्यकता से अधिक है, जिससे न सिर्फ खजाने पर बोझ बढ़ता है, बल्कि श्रम बाजार भी गड़बड़ा जाता है। अधिक टीचर, डॉक्टर, नर्स, नगरपालिका कर्मचारी नियुक्त करने की सरकारी क्षमता कम हो जाती है इसलिए भारत में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए सबसे अच्छा व महत्वपूर्ण सुधार यह होगा कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कटौती की जाये। जब एक प्राइवेट विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर ३५,००० रुपए प्रति माह लेकर सुखी व संतुष्ट रह सकता है तो यह क्या जरूरी है कि सरकारी इंटर कॉलेज के लेक्चरर का वेतन ७०,००० रुपए से शुरू किया जाए? इतने में तो दो लेक्चरर रखकर कॉलेजों में अध्यापकों की कमी को दूर किया जा सकता है और बेरोजगारी की समस्या को भी काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन क्या ८वां वेतन आयोग सरकारी वेतनों में कटौती करके आवश्यक सुधार की ओर भारत को लेकर जायेगा? शायद नहीं।
(लेखिका शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं)
