अरुण कुमार गुप्ता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिनों बड़े गर्व से देशवासियों को बधाई दी। बधाई भी जीडीपी ग्रोथ को लेकर, लेकिन इसमें भी मोदी जी का झूठ पकड़ा गया। आपको बता दें कि मोदी जी ने ७.५ प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की बात कही है। लेकिन यह वास्तव में ०.१ प्रतिशत है। जीडीपी का मतलब होता है ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट। इसका मतलब यह हुआ कि देश में एक तिमाही में कितना माल पैदा किया गया और कितना बेचा गया। जिसमें कंपनी का प्रोडक्शन, आईटी सर्विसेज, एग्रीकल्चर सब कुछ मिला लिया जाता है। जीडीपी की दो तरीके से गणना होती है। एक होती है नॉमिनल जीडीपी और दूसरी होती है रियल जीडीपी। नॉमिनल में प्रोडक्ट की कीमतें शामिल की जाती हैं, जिसमें महंगाई के कारण बढ़ोतरी हुई रहती है, लेकिन रियल जीडीपी में महंगाई को निकाल कर जो वास्तव में प्रोडक्ट की कीमत होती है उसी की गणना की जाती है। सरकार ने अप्रैल से लेकर जून तक की रियल जीडीपी ग्रोथ को बताया है, जो ७.८ प्रतिशत है। पिछले साल अप्रैल से जून तक की तिमाही में ८६ लाख करोड़ की जीडीपी बताई गई। मतलब ८६ लाख करोड़ की गुड्स एंड सर्विसेज बेची गई और इस साल की जीडीपी ८८ लाख करोड रुपए बताई गई है। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले साल की तिमाही से इस साल की तिमाही में सिर्फ दो २.६ प्रतिशत की ग्रोथ हुई है, लेकिन सरकार को लगा कि इससे तो मोदी जी की किरकिरी हो जाएगी। अब सरकार के नुमाइंदों ने पिछले साल की ८६ लाख करोड़ को घटाकर यानी रिवाइज कर ८० लाख करोड रुपए कर दिया। रिवाइज क्यों किया गया किसी को नहीं बताया गया। पिछले साल की रिवाइज जीडीपी ८० लाख करोड़ थी। वह इस वर्ष ८८ लाख करोड़ हो गई। इस दौरान महंगाई दर २.५ प्रतिशत थी। यदि महंगाई को एडजस्ट कर दिया जाए तो रियल ग्रोथ बचती है ० प्रतिशत। यदि वास्तव में जीडीपी ग्रोथ होती है तो शेयर बाजार बूम-बूम करता, लेकिन देश के शेयर बाजार की तो लंका लगी हुई है।
अडानी के बिजनेस वृद्धि मैनेजर!
पिछले १२ वर्षों से देश में कोई प्रधानमंत्री नहीं है। यदि यह कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि जिसे हम प्रधानमंत्री मानते हैं, वह देश के लिए नहीं अपने मित्र अडानी के लिए दिन-रात काम कर रहा है। १० अगस्त को उद्योगपति गौतम अडानी ने उज्बेकिस्तान के उद्योग मंत्री लजिस कुदरतों से मुलाकात की। इस मुलाकात में अडानी ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में निवेश की दिलचस्पी दिखाई। अडानी के फायदे की बात हो तो हमारे प्रधानमंत्री पीछे क्यों हटें। वे २९ अगस्त को उज्बेकिस्तान पहुंच गए। शायद अडानी ने कहा होगा कि मोदी जी उज्बेकिस्तान जाओ और डील फाइनल करो। यह पहला मौका नहीं है। मोदी जी की हर विदेश यात्रा अदानी के लिए होती है। यदि ऐसा कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। इससे पहले जून २०१५ में मोदी जी बांग्लादेश गए और अगस्त २०१५ में अडानी ने बांग्लादेश से बिजली की डील पक्की कर ली। मार्च २०१७ में मोदी जी मलेशिया गए और अप्रैल २०१७ में अडानी ने मलेशिया में मेगा कंटेनर पोर्ट प्रोजेक्ट की डील कर ली। जनवरी २०१८ में मोदी जी इजरायल गए और अडानी ने इजरायल की कंपनी के साथ मिलिट्री ड्रोन बनाने का काम शुरू कर दिया। जून २०१८ में मोदी जी सिंगापुर गए और सिंगापुर के प्रधानमंत्री से मुलाकात की। जुलाई २०१८ में सिंगापुर की कंपनी ने अडानी पोर्ट में १००० करोड़ का निवेश कर दिया। यही नहीं यह लिस्ट बहुत लंबी है, जिसमें श्रीलंका, नेपाल, केन्या, तंजानिया, वियतनाम और अब उज्बेकिस्तान। हर जगह सेम पैटर्न है। पहले मोदी जी अलग-अलग देश में जाते हैं और अडानी को उन देशों में बड़े प्रोजेक्ट मिल जाते हैं। इसलिए मोदी जी को अडानी का बिजनेस वृद्धि मैनेजर कहा जाता है।
