मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : युवा सवाल पूछें तो ‘माओवादी’!

दिल्ली लाइव : युवा सवाल पूछें तो ‘माओवादी’!

अरुण कुमार गुप्ता

देश की राजनीति में युवाओं के सवाल अब सत्ताधारियों के लिए असहज होते जा रहे हैं। रोजगार, भर्ती, परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर युवा सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन इन सवालों का सीधा जवाब देने के बजाय राजनीतिक बहस ‘माओवादी’, ‘नक्सली’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों तक पहुंच गई है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा कांग्रेस पर ‘माओवादी पार्टी’ बनने का आरोप इसी राजनीतिक टकराव की नई कड़ी है।
सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस आंदोलन में राजनीति कर रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन में राजनीतिक कार्यकर्ता की मौजूदगी से युवाओं की मूल समस्याएं खत्म हो जाती हैं? यदि किसी व्यक्ति या संगठन ने कानून तोड़ा है तो जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई भी, लेकिन हजारों युवाओं की शिकायत को केवल राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है।
सरकार के पास सत्ता है, प्रशासन है और जवाब देने का पूरा तंत्र है। इसलिए उससे सवाल पूछे जाएंगे। यदि भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी है तो आंकड़े सामने रखे जाएं। यदि परीक्षाओं में कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और यदि कहीं लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों ने बहस को और गंभीर बना दिया है। नक्सलवाद देश के सामने गंभीर सुरक्षा चुनौती है, लेकिन शांतिपूर्ण राजनीतिक विरोध और हिंसक उग्रवाद के बीच फर्क करना लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी है। सरकार की आलोचना करना अपने आप में नक्सलवाद नहीं हो सकता। सरकार को याद रखना चाहिए युवा को भाषण नहीं, रोजगार चाहिए। उसे आरोप नहीं, निष्पक्ष परीक्षा चाहिए। उसे राजनीतिक नारे नहीं, भर्ती की समयबद्ध प्रक्रिया चाहिए।
जीडीपी की चमक में युवाओं का भविष्य धुंधला क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बता रहे है। मोदी जी लगातार ऊंची जीडीपी वृद्धि, रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, बढ़ते विदेशी निवेश और बड़े बुनियादी ढांचा निवेश को अपनी उपलब्धि बता रहे है, लेकिन दूसरी तरफ करोड़ों युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है, नौकरी कहां है? सरकार के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार, वर्ष २०२४-२५ में बेरोजगारी दर ३.१ प्रतिशत रही। वहीं रोजगार में लगे लोगों की संख्या लगभग ६१.६ करोड़ बताई गई। सरकार का दावा है कि स्वरोजगार, विनिर्माण, सेवा क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पीएलएफएस के मासिक जून २०२६ के अनुसार, बेरोजगारी दर ५.५ प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में ६.६ प्रतिशत दर्ज की गई। यहां केवल बेरोजगारी दर देखना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना होगा कि कितनी नौकरियां नियमित हैं, कितनी अस्थायी हैं और कितने लोग अपनी योग्यता से कम स्तर का काम करने को मजबूर हैं। देश में हर वर्ष करोड़ों युवा सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं। कई बड़ी भर्तियों में लाखों उम्मीदवार कुछ हजार पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। यही कारण है कि भर्ती में देरी, परीक्षा विवाद या रिक्त पदों का लंबे समय तक खाली रहना युवाओं के बीच असंतोष का कारण बनता है। सरकार का कहना है कि ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम’ और पूंजीगत व्यय में वृद्धि से रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। हालांकि, विकास का लाभ पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के रूप में दिखाई नहीं दे रहा। सवाल यह नहीं कि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या आर्थिक विकास का लाभ उस युवा तक पहुंच रहा है, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है या बेहतर रोजगार की तलाश में है?

अन्य समाचार