सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही घोटाले को देखते हुए चुनावी बॉन्ड पर रोक लगा दी हो, पर इससे भाजपा के चुनावी चंदे पर कोई फर्क नहीं पड़ा है, बल्कि वह बढ़ा ही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनावी बॉन्ड पर रोक लगने के बाद भाजपा के चुनावी चंदे में ५४ फीसदी का उछाल आया है। फिलहाल उसके खाते में ९,९९६ करोड़ रुपए जमा हैं। इस बात का खुलासा भाजपा की ऑडिट रिपोर्ट से हुआ है।
भाजपा के वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, २०२४-२५ में पार्टी ने चुनावी प्रचार और सामान्य प्रचार पर कुल ३,३३५.३६ करोड़ रुपए खर्च किए थे। इसी अवधि में १८वीं लोकसभा और आठ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हुए थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह खर्च २०१९-२० के मुकाबले लगभग ढाई गुना है। उस समय, २०१९ के लोकसभा और सात राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने चुनाव प्रचार और सामान्य प्रचार पर १,३५२.९२ करोड़ रुपए खर्च किए थे।
४४ दिन चला चुनाव
चुनाव आयोग ने २०२४ के लोकसभा चुनावों की घोषणा १६ मार्च को की थी, जिसके चलते प्रचार की शुरुआत वित्त वर्ष २०२३-२४ में ही हो गई थी। चुनाव १९ अप्रैल से १ जून २०२४ के बीच ४४ दिनों तक चला। चुनाव से पहले वाले साल यानी २०२३-२४ में भी भाजपा ने चुनाव प्रचार और सामान्य प्रचार पर १,७५४.०६ करोड़ रुपए खर्च किए थे।
भाजपा ने बहाए `५,००० करोड़!
चुनावी बॉन्ड रोके जाने का भाजपा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा है। उसके खजाने में न जाने कहां से पैसा आ रहा है। २०२४ के लोकसभा और आठ विधानसभा चुनावों से पहले के दो वर्षों में चुनाव प्रचार पर भाजपा ने कुल ५,०८९.४२ करोड़ रुपए खर्च किए। इस बात का खुलासा भाजपा की ऑडिट रिपोर्ट से हुआ है। यह राशि २०१९ के लोकसभा और सात विधानसभा चुनावों से पहले के दो वर्षों में किए गए २,१४५.३१ करोड़ रुपए के खर्च से दोगुने से भी अधिक है।
२०१९-२० और २०२४-२५ के दौरान जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, उनमें महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, ओडिशा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश शामिल थे। २०२४-२५ में इन सात राज्यों के अलावा जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव कराए गए। भाजपा द्वारा चुनाव आयोग को २७ दिसंबर २०२५ को सौंपे गए वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के कुल ३,७७४.५८ करोड़ रुपए के खर्च का करीब ८८ प्रतिशत हिस्सा चुनावी खर्च का था। आयोग ने इस रिपोर्ट को इस हफ्ते सार्वजनिक किया। ‘चुनाव / सामान्य प्रचार’ पर हुए कुल खर्च में से करीब ६८ प्रतिशत राशि विज्ञापन और प्रचार पर खर्च की गई, जो २,२५७.०५ करोड़ रुपए रही। इसमें सबसे अधिक खर्च १,१२४.९६ करोड़ रुपए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हुआ। इसके बाद ८९७.४२ करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए गए।
