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फलदायी होती है देव दिवाली

शीतल अवस्थी

कार्तिक पूर्णिमा को यदि कृत्तिका नक्षत्र हो तो यह ‘महाकार्तिकी’ होती है, भरणी नक्षत्र होने पर विशेष रूप से फलदायी होती है और रोहिणी नक्षण होने पर इसका महत्व बहुत ही अधिक बढ़ जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान का विशेष महत्व है। इस दिन जो भी दान किया जाता है उसका कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। इस दिन अन्न, धन व वस्त्र दान का विशेष महत्व है। मान्यता तो यह भी है कि इस दिन व्यक्ति जो भी दान करता है वह मृत्युपरांत स्वर्ग में उसे पुन: प्राप्त होता है।
कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नाम के असुर का अंत किया था और भगवान विष्णु ने उन्हें त्रिपुरारी कहा। इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति को ज्ञान और धन की प्राप्ति होती है। इस दिन चंद्रमा उदय के समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिवजी प्रसन्ना होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य आदि का दिन भी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि पौधों में तुलसी मुझे प्रिय है, मासों में कार्तिक मुझे प्रिय है, दिवसों में एकादशी और तीर्थों में द्वारका मेरे हृदय के निकट है। इसलिए कार्तिक मास में श्री हरि के साथ तुलसी और शालीग्राम के पूजन से भी पुण्य मिलता है। आज भगवान विष्णु का प्रथम अवतार मत्स्यावतार हुआ था। भगवान को यह अवतार वेदों, प्रलय के अंत तक सप्त ऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था। अत: यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा नदी में स्नान करने से पूरे वर्ष स्नान का फल मिलता है। कहते है आज तारों की छाव में गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों व पवित्र सरोवरों में स्नान करने से सैंकड़ों फलों की प्राप्ति होती है। यमुनाजी पर कार्तिक स्नान की समाप्ति करके राधा-कृष्ण का पूजन, दीपदान, शय्यादि का दान तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। सभी सुखों व ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली कार्तिक पूर्णिमा को की गई पूजा और व्रत के प्रताप से हम ईश्वर के और करीब पहुंचते हैं। आज भगवान सत्यनारायण की पूजा से प्रतिष्ठा प्राप्ति होती है, शिवजी के अभिषेक से स्वास्थ्य और आयु में बढ़ोतरी, दीपदान से भय से मुक्ति और सूर्य आराधना से लोकप्रियता और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होते हैं तो फिर वे कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से वे कार्यरत हो जाते हैं। यही वजह है कि दीपावली को लक्ष्मीजी का पूजन बिना विष्णुजी के श्रीगणेश के साथ किया जाता है। जबकि आज देव दीवाली पर विष्णुजी के पूजन का विशेष महत्व है। आज अगर संभव हो तो नदी में स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। आज नदी स्नान, दान, हवन, यज्ञ व उपासना का अनंत फल प्राप्त होता है। आज के दिन ब्राह्मणों को दान देने का तो फल मिलता ही है साथ ही बहन, भांजे, बुआ आदि को भी दान देने से पुण्य मिलता है। शाम के समय निम्न मंत्र से चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।
वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु।
आज मात्र एक समय भोजन करना चाहिए और सामर्थ्यानुसार दान अर्थात, दुधारू गाय और केला, खजूर, नारियल आदि का दान देना चाहिए। आज रात्रि में व्रत करके वृष (बैल) दान करने से शिवपद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पत्ति बढ़ती है। जो व्यक्ति आज उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। कार्तिक पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी प्राप्त है।
सायंकाल देव मंदिरों, चौराहों, पीपल तथा तुलसी के पौधों के पास दीप जलाने से भी पुण्य फलों की प्राप्ति एवं पूर्वजों की कृपा प्राप्त होती है व पापों का नाश होता है। कार्तिक पूर्णिमा पर गरीबों, निर्धनों एवं ब्राह्मणों को भोजन एवं दान देने, माता-पिता एवं बड़े बुजुर्गों का चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लेने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। आज के दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का अवश्य पूजन करना चाहिए। आज उपवास करके भगवान का स्मरण, चिंतन करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है तथा सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। इस दिन मेष (भेड़) दान करने से ग्रहयोग के कष्टों का नाश होता है। इस दिन कन्यादान से ‘संतान व्रत’ पूर्ण होता है। कार्तिकी पूर्णिमा से प्रारंभ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस दिन कार्तिक के व्रत धारण करने वालों को ब्राह्मण भोजन, हवन तथा दीपक जलाने का भी विधान है। कार्तिक की पूर्णिमा वर्ष की पवित्र पूर्णमासियों में से एक है।
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