मुख्यपृष्ठनए समाचारहिंदुस्थान के ‘चिकन नेक' पर ड्रैगन का साया!

हिंदुस्थान के ‘चिकन नेक’ पर ड्रैगन का साया!

आखिर सिलीगुड़ी कॉरिडोर के लिए खतरा क्यों बढ़ रहा है, यह जानने की कोशिश करते हैं। चिकन नेक के नाम से जाना जाने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर हिंदुस्थान का सबसे संवेदनशील रणनीतिक हिस्सा है। महज २० से २२ किमी चौड़ी जमीन की यह पट्टी मुख्य हिंदुस्थान को पूरे नॉर्थ-ईस्ट से जोड़ती है।
तीस्ता नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यदि चीन इस बैराज प्रोजेक्ट को फंड और डिजाइन करता है, तो उसके इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और उपकरणों की मौजूदगी हिंदुस्थान की सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर हो जाएगी। इसके अलावा, तीस्ता बेसिन में चीनी प्रोजेक्ट आने से बीजिंग को भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर, सैन्य ठिकानों और सिक्किम सीमा के करीब इलेक्ट्रॉनिक जासूसी और निगरानी नेटवर्क स्थापित करने का मौका मिल सकता है।
आइए अब बात करते हैं इसके रणनीतिक और जल कूटनीति के असर पर। युद्ध या तनाव की स्थिति में चीन सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दबाव बनाकर हिंदुस्थान के पूर्वोत्तर राज्यों का संपर्क मुख्य भूमि से काटने की कोशिश कर सकता है। भारत लंबे समय से तीस्ता जल समझौते पर बातचीत कर रहा है, लेकिन चीन के प्रवेश से हिंदुस्थान का द्विपक्षीय प्रभाव कमजोर होगा। चटगांव बंदरगाह और मोंगला पोर्ट के बाद, तीस्ता प्रोजेक्ट के जरिए चीन हिंदुस्थान को जमीनी सीमा पर भी घेरने की नीति को मजबूत कर रहा है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस परियोजना के बहाने बांग्लादेश को अपने ‘डेड ट्रैप’ में फंसा सकता है, जिससे भविष्य में ढाका की विदेश नीति पूरी तरह नई दिल्ली के खिलाफ और बीजिंग के पक्ष में झुक सकती है।
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की इस नई नीति ने हिंदुस्थान के सामने अपनी सीमाओं और रणनीतिक गलियारों की सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। हिंदुस्थान को अब अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक संवाद तेज करने और चीन के इस बढ़ते दखल का ठोस जवाब ढूंढने की सख्त जरूरत है।

अन्य समाचार