शीतल अवस्थी
जगत् जननी, शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की उपासना एक ऐसा मार्ग है, जिस पर चलकर मनुष्य सभी सुखों का उपभोग व अपने कर्त्तव्य का पालन करके मोक्ष प्राप्त करता है। नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा विशेष फलदायी है। मनुष्य की शक्तियां अनंत हैं। यदि वह उनका सदुपयोग करे तो श्रेष्ठ विश्व का निर्माण कर सकता है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने समुद्र तट पर शारदीय नवरात्र पूजन किया था। भगवान श्रीराम ने आदि शक्ति जगदंबा की आराधना नवरात्रि के विशेष पर्व में कर भगवती की अद्वितीय कृपा प्राप्त कर अत्याचारी रावण का वध किया था। मां ‘दुर्गा’ की पूजा व साधना नवरात्रि में अनेक विद्वानों एवं साधकों ने बताई है, किंतु सबसे प्रामाणिक व श्रेष्ठ आधार ‘दुर्गा सप्तशती’ है। जिसमें सात सौ श्लोकों के द्वारा भगवती दुर्गा की अर्चना व वंदना की गई है। नवरात्रि में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ दुर्गा सप्तशती के श्लोकों द्वारा मां-दुर्गा देवी की पूजा नियमित शुद्वता व पवित्रता से की जाए तो निश्चित रूप से मां प्रसन्न हो इष्ट फल प्रदान करती हैं। मां दुर्गा को तुलसी दल व दूर्वा चढ़ाना निषिद्ध है। पूजा में लाल रंग का आसन प्रयोग करना उत्तम है। लाल रंग का ऊनी आसन होना चाहिए। यदि ऐसा आसन उपलब्ध नहीं है तो एक कंबल को चार पर्त करके बिछा लें, फिर उस पर लाल रंग का कोई भी कपड़ा डाल दें। साधना के पश्चात आसन को प्रणाम करके लपेट कर सुरक्षित रख दें। पूजा के समय यदि संभव हो तो लाल वस्त्र पहनें। लाल रंग का तिलक भी लगाएं। इससे विशेष ऊर्जा प्राप्त होगी। प्रात:काल प्रसाद के लिए मां भगवती को शहद मिलाकर दूध अर्पित करें। पूजा के बाद इस प्रसाद को ग्रहण करें तो आत्मा व शरीर को बल प्राप्त होता है। यह अनुभूत उपाय है। नवरात्रि के दिनों में कम से कम एक बार दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य ही करना चाहिए। यदि संस्कृत में पूर्ण रूप से उच्चारण न कर सकें तो हिंदी में भी पाठ कर सकते हैं। समयाभाव व व्यस्तता को ध्यान में रख दुर्गा-सप्तशती के कुछ सूक्ष्म पाठों को कम समय में कर अभीष्ट फल को प्राप्त किया जा सकता है। दुर्गा सप्तशती में कम समय में इच्छित फल पाने हेतु सात सौ श्लोकों के स्थान पर ‘सप्तश्लोकी दुर्गा’ पाठ का विधान है, जिसे अत्यंत कम समय में करके भी मनवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। इसी तरह दुर्गा कवच, अर्गला, कीलक, रात्रिसूक्त, देवी सूक्त, अपराध क्षमा-प्रार्थना, अपराध क्षमा-स्त्रोत ऐसे हैं, जिन्हें किसी भी स्थान, देशकाल व परिस्थिति में करके भी मनोवांछित फल अधिक शीघ्रता से प्राप्त किया जा सकता है। अत: नवरात्रि में भगवती जगदम्बा जो विश्व की प्राण आत्मा व रक्षा शक्ति हैं, उनकी स्थापना एवं पूजा विधि-विधान के साथ प्रत्येक व्यक्ति को करनी चाहिए। इस पूजा में पवित्रता, नियम व संयम तथा ब्रह्मचर्य का विशिष्ट महत्व है। इस पूजा के समय घर व देवालय को तोरण व विविध प्रकार के मांगलिक पत्र, पुष्पों से सजा सुंदर सर्वतोभद्र मंडल, स्वास्तिक, नवग्रहादि, ओंकार आदि की स्थापना विधवत शास्त्रोक्त विधि से करने या कराने तथा स्थापित समस्त देवी-देवताओं का आवाहन उनके ‘नाम मंत्रों’ द्वारा कर षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए, जो विशेष फलदायिनी है। अष्टमी के दिन यज्ञ संपन्न करना चाहिए। नवरात्रि में नौ दिन घर में सुबह-शाम मां दुर्गा के नाम की ज्योत अवश्य जलाएं।
