वक्त कहता है, तू अपनी रफ्तार तेज कर
उम्र कहती है, तेरे उछलने के दिन गए
असमंजस वाली स्थिति में उलझा मैं,
सोचने को मजबूर हूं, वक्त की मानूं भी तो रफ्तार कैसे बढ़ाऊं?
क्योंकि उम्र उछलने को मना करने का इशारा करती है।
दोनों अपनी जगह सही कह रहे हैं। ‘जोश-खरोश’ खप चुका है सारा।
इच्छाओं को ‘घुन’ लग चुकी है।
ख्वाब नींद में ‘धूल चाट रहे हैं’।
मुझ पर बुढ़ापा सवार हो चुका है।
कोई पास नहीं टपकता।
ये शब्द ही मेरे अपने हैं।
मेरे बतियाने के साथी हैं।
इनसे विचारों का आदान-प्रदान कर,
तसल्ली कर लेता हूं, संतुष्ट रहता हूं।
मगर लोग हैं कि मेरी ‘लिखित मनोवस्था’ को शिकायत समझ बैठे हैं
अब किस-किस को सफाई दूं?
‘हाल-ए-दिल’ की हकीकत कह-सुनाऊं?
मेरे लिखे को तवज्जो न देने वाले
भला मेरे कहे को कितना स्वीकारेंगे?
अब सोच रहा हूं…. अगर ये शिकायत है,
तो किसके आगे गिड़गिड़ाऊं?
मुझे नजरअंदाज करने वालों में
है कौन ‘हमदर्द’ मेरा, जो एक मुस्कान
मुझ वृद्ध पर भी न्योछावर कर दे,
ताकि मैं फिर से “जीने का भ्रम” पाल लूं।
आमीन / तथास्तु
(अधिकतर परिवारों में वृद्धों की पूछ नहीं है। खेद सहित, कड़वा सच है ये।)
त्रिलोचन सिंह अरोरा
