जीवन की जंग लड़ता तन, पीड़ा से भरा हर श्वास,
फिर भी सभी को चाहिए, लक्ष्यों का विकास।
रिश्तों की थकान, दुनियादारी का बोझ अपार,
फिर भी उलझे जाते हैं, लिए कामों के भार।
भूल गए सभी शायद, इंसान कोई मशीन नहीं,
हर धड़कन की कीमत होती, कोई मामूली चीज नहीं।
उपलब्धियां तभी सार्थक हैं, जब संवेदना साथ चले,
कर्तव्य के संग मानवता भी, हर निर्णय में साथ मिले।
क्या लक्ष्य इतने आवश्यक हैं, कि पीड़ा भी अनदेखी हो जाए,
क्या व्यवस्था इतनी कठोर हो, कि करुणा ही खो जाए?
ऐसे क्षणों में ज़रूरत है, दुआ और प्यार की,
न कि हर दिन बढ़ती हुई, चिताओं के बोझ की।
जीवन सबसे ऊपर है, यह बात समझनी होगी,
संवेदनाओं से ही व्यवस्था को, अब अपनी गरिमा गढ़नी होगी।
मुनीष भाटिया
ऐरो सिटी,
मोहाली
