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संपादकीय : एडवोकेट सरोदे कभी रुकते नहीं

असीम सरोदे एक जाने-माने वकील हैं, लेकिन उससे भी बढ़कर वे सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेनेवाले कार्यकर्ता हैं। सरोदे ने राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष के बारे में कुछ कड़े बयान दिए थे। इसी आधार पर सरोदे का सनद तीन महीने के लिए रद्द कर दिया गया। यह कानून के क्षेत्र में रुचि रखनेवाले सभी लोगों के लिए एक झटका है। कई लोग इस बात से खुश हो सकते हैं कि सरोदे तीन महीने तक वकालत नहीं कर पाएंगे, लेकिन सरोदे जैसे लोग रुकते नहीं। जब हमारे देश में समान न्याय की धज्जियां उड़ रही हों, तब वकीलों का न बोलना एक अपराध है। एक वकील ने अदालती कार्यवाही के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की। उस वकील को कोई बड़ी सजा नहीं मिली, लेकिन राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष पर अपनी राय व्यक्त करते ही सरोदे को सजा सुना दी गई। देश की न्यायपालिका दबाव में काम कर रही है। सभी संवैधानिक संस्थाएं खुद को नग्न कर चुकी हैं। किसी को इस बात पर गुस्सा नहीं आ रहा कि भाजपा प्रवक्ताओं को उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया जा रहा है। लाखों मुकदमे भरे पड़े हैं। सर्वोच्च न्यायालय में गुजरात के लोगों की भर्ती की जा रही है। लेकिन बार काउंसिल इस ओर ध्यान नहीं दे रही है, लेकिन राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ सरोदे के बयान को आपत्तिजनक मान लिया जाता है। चंद्रचूड़ ने शुरुआत में महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच फूट और एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा उसे दिए गए समर्थन पर चिंता व्यक्त की थी, लेकिन बाद में तोल बिगड़ गया। तत्कालीन राज्यपाल का बहुमत साबित करने संबंधी
फैसला गलत
था। विधानसभा अध्यक्ष भाजपा कार्यालय में एक नौकर की तरह काम करते थे। आज भी वे कुछ अलग करते नहीं दिख रहे हैं। कल भाजपा कार्यालय के शिलान्यास समारोह के दौरान विधानसभा अध्यक्ष पार्टी के मंच पर मौजूद थे। यह किस नीति के अंतर्गत आता है? उन्होंने जो फैसला सुनाया, वह न्याय देने की काजी पद्धति के तहत दिया गया फैसला था। दिवंगत न्यायविद् नानी पालकीवाला ने भारत के तत्कालीन महाधिवक्ता सर नौशेर खां इंजीनियर से उनकी न्याय देने की पद्धति के बारे में पूछा था। उस समय उन्होंने उत्तर दिया था, ‘मैं अब इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि न्याय देने की काजी पद्धति बेहतर है। उस पद्धति के अनुसार, कौन सही है और कौन दोषी, इसका निर्णय एक ही व्यक्ति को सौंपा जाता है। मामला यहीं खत्म हो जाता है।’ आज हमारे देश में भी वही काजी पद्धति लागू हो गई होगी। भारतीय संविधान ने नागरिकों को सच को सच और झूठ को झूठ बोलने का अधिकार दिया है। राज्यपाल या विधानसभा अध्यक्ष कोई देवदूत नहीं हैं। ये लोग राजनीतिक दल के प्रवाह में झाड़ की तरह बहते रहे हैं इसलिए कोई भी निर्णय लेते समय, वे उस व्यक्ति के हितों का ध्यान रखेंगे, जिसने उन्हें नियुक्त किया है। महाराष्ट्र में सत्ता हस्तांतरण के दौरान यही हुआ था। अगर सरोदे ने इस पर टिप्पणी की तो उनकी वकालत संकट में पड़ गई। आपातकाल के दौरान जो हुआ, उसका कोयला आज भी सुलग रहा है। कहा जाता है कि उस समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन हुआ था तो अब ऐसा क्या हो रहा है जो अलग है? भारत में अदालतों में दावे जितने लंबे समय तक लटके रहे हैं, उतना दुनिया में कहीं और नहीं। महाराष्ट्र में एक संविधान-विहीन सरकार
को जबरदस्ती सत्ता
सौंप दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने उस सरकार को (बिना किसी मदद) के चलने दिया। यह शासकों को खुश करने के लिए किया गया था। सरकारें बदल गईं, लेकिन उस मामले में फैसला अभी तक नहीं सुनाया गया है। अगर यही हमारी न्याय व्यवस्था है, तो हम लोकतंत्र और संसद के रक्षक के रूप में किसे देखें? नेपाल में, शासकों के इस उत्पीड़न के खिलाफ जनता भड़क उठी, लेकिन अगर महाराष्ट्र या देश की समग्र स्थिति के बारे में नेपाल का उदाहरण दिया जाता है तो सरकार को आग लग जाती है। उस व्यक्ति के खिलाफ मामले दर्ज किए जाते हैं, लेकिन अब मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई कभी-कभी नेपाल का ही उदाहरण देते हैं तो क्या उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जाएगा? देश में सच बोलने पर प्रतिबंध है। सच के लिए आवाज उठानेवालों को सजा दी जाती है। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में यही हुआ था। नेहरू से लेकर गांधी, सावरकर, सुभाषचंद्र बोस ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपनी वकालत और कानूनी ज्ञान को दांव पर लगा दिया। वर्तमान में देश पर ‘देशी अंग्रेजों’ का ही शासन है। अगर कोई संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के भीतर उनकी मनमानी के खिलाफ मजबूत राय व्यक्त करता है, तो उसका मुंह बंद कर दिया जा रहा है। बार काउंसिल जैसी संस्था ने भी तीन महीने तक सच्चाई के लिए लड़ रहे एडवोकेट असीम सरोदे की आवाज दबा दी। एडवोकेट सरोदे पर पेशेवर कदाचार का आरोप लगाया गया। भाजपा प्रवक्ता चेन्नई और मुंबई में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बन जाते हैं। यह पेशेवर कदाचार नहीं है, लेकिन अगर सरोदे अदालत के बाहर सच बोलते हैं, तो राम शास्त्री के महाराष्ट्र में यह अपराध बन जाता है। एक दिन हमारे कानून और न्यायपालिका को इन सबका प्रायश्चित करना होगा। लड़ने वाले इंसान लड़ते ही रहते हैं। वे रुकते नहीं। एडवोकेट सरोदे नहीं रुकेंगे!

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