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संपादकीय : ब्रिक्स, बिरयानी और खिचड़ी

भारत में एक बार फिर खाने-पीने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है और विवाद का केंद्र बेशक मोदी सरकार ही है। वैश्विक स्तर पर भी सरकार द्वारा खाने-पीने के मामले में की गई मनमानी हंसी का पात्र बन रही है। यह विवाद हुआ है दिल्ली में आयोजित `ब्रिक्स’ सम्मेलन को लेकर। ब्रिक्स अब ११ देशों का समूह बन चुका है। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अप्रâीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। इसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह बताया जाता है। १२-१३ सितंबर को दिल्ली में १८वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत ने की और इन सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों का हमने स्वागत-सत्कार किया। परंपरा के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कई वैश्विक मित्रों को गले लगाया। ईरान के बहादुर राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान का हाथ वह काफी देर तक अपने हाथ में थामे मंच पर टहलते रहे। मानो उन्हीं की प्रेरणा से ईरान, अमेरिका और इजरायल से युद्ध लड़ रहा हो। हालांकि `ब्रिक्स’ सम्मेलन में विवाद की वजह बना इन तमाम वैश्विक मेहमानों के लिए सरकार की ओर से रखा गया भोजन। १२ सितंबर को भारत मंडपम में प्रधानमंत्री मोदी ने नेताओं के लिए गाला डिनर दिया। यह मेन्यू पूरी तरह से शाकाहारी था। वैश्विक नेताओं के लिए मांसाहारी व्यंजन नहीं थे। उन्हें जबरन `घास-फूस’ खाने पर मजबूर किया गया। यह ध्यान देने योग्य है कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस गाला डिनर में शामिल नहीं हुए। `गाला डिनर’ में क्या था? ढोकला मील, मशरूम कबाब, पनीर लबाबदार, मिलेट पुलाव, गुजराती शैली का ढक्कली बेले सारू यानी टमाटर-दाल का रस्सा, मीठे में जलेबी, फिरनी जैसे व्यंजन थे। इससे बेहतर डिनर तो अंबानी, अडानी के यहां शादियों में होता है। सुप्रिया सुले की बेटी रेवती की शादी का खाना स्वादिष्ट था। भारत में शाकाहारी-मांसाहारी भोजन की शानदार परंपरा रही है। उसमें क्षेत्रीय विविधता है। इसके बावजूद वैश्विक नेताओं को खांडवी, ढक्कली बेले सारू और
मिलेट जैसे व्यंजन
खिलाए गए। न केवल भारत के, बल्कि दुनिया के ८० फीसदी लोग मांसाहारी हैं। दिल्ली में आए नेताओं में से कोई भी शाकाहारी नहीं था, फिर भी उन पर शाकाहार थोपकर मोदी सरकार ने क्या हासिल किया? सरकार ने अपनी शाकाहारी पसंद को वैश्विक नेताओं पर थोपा है, तो यह गलत है। दिल्ली `नॉनवेज’ खाने का वैश्विक अड्डा है। जहां वैश्विक नेताओं के लिए `गाला डिनर’ हुआ, वहीं आस-पास `करीम्स’ जैसे रेस्टोरेंट का मांसाहार वैश्विक नेताओं के लिए एक बेहतरीन दावत साबित होता। तंदूरी चिकन, बिरयानी, बटर चिकन, गोवन फिश करी, करीम्स के बुर्रा कबाब, कोल्हापुरी पांढरा-तांबड़ा रस्सा, सावजी, मालवणी फिश जैसे व्यंजन वैश्विक नेताओं के `डिनर’ में रखे जाते, तो वे तृप्त होकर अपने देश लौटते; लेकिन मोदी और उनके लोगों ने अपना शाकाहार थोप दिया। अब ये लोग कहते हैं कि यह `बापू’ का देश है, इसलिए शाकाहार को महत्व दिया। यह सरासर झूठ है। हिंदुओं के प्रसिद्ध तीर्थस्थल महाबलीपुरम में जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आए थे, तब उनके भोजन में मांसाहारी `मेन्यू’ की भरमार थी और देशभर से मांसाहारी खाना बनाने वाले शेफ महाबलीपुरम बुलाए गए थे। अब बात रही `बापू’ की। बापू का आदर मोदी जैसे लोग कब से करने लगे? बापू खुद शाकाहारी जरूर थे, लेकिन उन्होंने अपना शाकाहार दूसरों पर कभी नहीं थोपा। उनका मानना था कि हर किसी को अपने खाने-पीने की परंपराओं का पालन करना चाहिए। वर्धा के सेवाग्राम आश्रम में जब खान अब्दुल गफ्फार खान और उनके बेटे आए, तो उनके लिए मांसाहारी खाने-नाश्ते की खास व्यवस्था की गई थी। इसके लिए आश्रम के बाहर अलग से रसोई बनाई गई थी। मोरारजी देसाई जब प्रधानमंत्री के रूप में रूस यात्रा पर गए, तब रूस की परंपरा के अनुसार मेहमानों के सामने रखे कप में `वोदका’ परोसी गई। मोरारजी तो ठहरे `शराबबंदी’ वाले, इसलिए समस्या खड़ी हो गई। जब यह बात प्रधानमंत्री देसाई के सामने गई, तो उन्होंने कहा, `अगर यह रूस की
वोदका परंपरा
है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मेरे सामने रखे प्याला में भी वोदका डालिए। मैं उठाऊंगा, लेकिन होंठों से नहीं लगाऊंगा।’ यह वैश्विक परंपराएं निभानी पड़ती हैं। हम खिचड़ी खाते हैं, इसलिए वैश्विक नेता भी खिचड़ी खाएं, यह जिद गलत है। वैश्विक मंच पर भारत को शाकाहारी देश के रूप में दिखाना भारत की मांसाहारी परंपरा का अपमान है। भारत के अधिकांश देवता क्षत्रिय थे। स्वयं प्रभु श्रीराम क्षत्रिय थे। रामायण और महाभारत में `हिंसा’ यानी युद्ध तो हुए ही हैं, लेकिन जिन्होंने कभी युद्ध नहीं किया, कभी हाथ में हथियार नहीं उठाया, वे `शौर्य’ को क्या समझेंगे? भारत को पूरी तरह शाकाहारी बनाना मोदी और उनके विचारकों का ध्येय है। स्कूलों में मिड-डे मील का ठेका अब इस्कॉन जैसी संस्थाओं को सौंप दिया गया है। उन्होंने बच्चों के खाने से `अंडा’ ही गायब कर दिया। भोजन के माध्यम से स्थानीय संस्कृति को बदलने की मुहिम शुरू हो चुकी है। भारत की अधिकांश आबादी मांसाहार है। एक बड़ा वर्ग मांस-मछली बेचकर अपनी आजीविका चलाता है। लेकिन एक खास `अंधभक्त’ समुदाय को शाकाहारी भोजन पसंद है, इसलिए वे अपनी पसंद पूरे समाज पर थोपें, यह ठीक नहीं है। शाकाहार या मांसाहार भोजन हर किसी का व्यक्तिगत मामला है। इसमें सरकार या राजनीतिक दलों को दखल नहीं देना चाहिए। मुंबई जैसे शहर में कुछ उपद्रवियों ने शाकाहारी आंदोलन शुरू कर दिया और मांसाहारी लोगों को मकान देने से मना कर दिया। यह तो अपराध ही है, लेकिन सरकार भ्रष्टाचार का मांसाहार करती है और लोगों को मछली-मुर्गियां नहीं खाने देती। सरकारी दबाव के कारण कई सरकारी भोजनालयों में `मांसाहार’ बंद किया जा रहा है। हमारी खान-पान की संस्कृति को नष्ट करने का अधिकार किसी पार्टी, पंथ या आर्थिक समूह को नहीं है। जिसे जो पसंद है, वह वही खाएगा। मोदी को खिचड़ी पसंद है, वह और उनके अंधभक्त `खिचड़ी’ और पैसे खाएंगे। जिन्हें बिरयानी पसंद है, वे बिरयानी खाएंगे। `ब्रिक्स’ में भारत की जो जग-हंसाई हुई, वह थोपे गए शाकाहार की वजह से ही हुई!

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