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सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट मत…`किसी भी गुट को आरक्षित चिह्न देने की जरूरत नहीं थी!’

-‘बालासाहेब के नाम पर नहीं, अपनी ताकत पर मांगते जनादेश’

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

शिवसेना पार्टी और धनुष-बाण चुनाव चिह्न की सुनवाई कर रहे सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को शिंदे गुट से सवालों की बौछार कर दी और उसे कटघरे में खड़ा कर दिया। न्यायालय ने सवाल किया कि जिन गद्दार विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी, उन विधायकों का विधानसभा में बहुमत राजनीतिक पार्टी के स्वामित्व का पैâसला करने के लिए सुरक्षित मापदंड वैâसे माना जा सकता है? साथ ही चुनाव आयोग को किसी भी गुट को आरक्षित चुनाव चिह्न देने की जरूरत नहीं थी। दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न चुनने और बालासाहेब की ताकत पर नहीं, बल्कि उन्हें अपनी ताकत पर चुनाव लड़ने के निर्देश दिए जा सकते थे, ऐसी कड़ी टिप्पणी भी न्यायालय ने सुनवाई के दौरान की।
न्यायालय की अहम टिप्पणियां
संविधान पीठ के पैâसले के पीछे कारण यह है कि चुनाव चिह्न का विवाद राजनीतिक पार्टी से संबंधित है, जबकि अयोग्यता का मुद्दा विधानसभा में किसी व्यक्ति के आचरण से संबंधित है। विधानमंडल में किसी पार्टी के विधायकों का समूह राजनीतिक पार्टी का प्रतिबिंब हो सकता है।
धनुष-बाण पर शिंदे गुट की बढ़ी धड़कन!
शिवसेना पार्टी और धनुष-बाण चुनाव चिह्न को लेकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई चल रही है। बुधवार को लगातार दूसरे दिन शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के पैâसले का समर्थन करने का प्रयास किया। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने आयोग के पैâसले पर गंभीर सवाल उठाए। जिन गद्दार विधायकों की पात्रता ही जांच की प्रक्रिया में है, उनकी संख्या के आधार पर निर्भर रहना कानूनी जटिलता पैदा करता है, यह बात न्यायमूर्ति ने रेखांकित की।
इस दौरान कौल ने सुभाष देसाई मामले का संदर्भ दिया। हर कोई पार्टी के संविधान का पालन करने का दावा करता है। लेकिन जब हम संगठनात्मक संरचना की जांच करते हैं, तो क्या दिखाई देता है? कौल ने कहा कि शिवसेना की संगठनात्मक संरचना मुख्य रूप से नामित सदस्यों से बनी थी। वह पार्टी या कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब नहीं थी। कार्यकर्ताओं की संख्या इतनी अधिक थी कि प्रत्येक सदस्य को आयोग के समक्ष उपस्थित कराना संभव नहीं था। निर्वाचित प्रतिनिधि विभाजित हो गए थे और कुछ को अयोग्यता की कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। इसलिए तीनों मापदंडों की कुछ सीमाएं थीं, ऐसा दावा कौल ने किया। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने सीधे आरक्षित चुनाव चिह्न को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि तीनों मापदंडों की अपनी-अपनी सीमाएं थीं, तो एक और विकल्प उपलब्ध था।
किसी एक गुट को आरक्षित चुनाव चिह्न का लाभ देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न चुनने और बालासाहेब की ताकत के आधार पर नहीं, बल्कि उन्हें अपनी ताकत के आधार पर चुनाव लड़ने के निर्देश दिए जा सकते थे। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने यह स्पष्ट टिप्पणी की। पिछले महीने शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने धनुष-बाण चुनाव चिह्न को प्रâीज करने का अनुरोध किया था। इस पृष्ठभूमि में न्यायालय द्वारा दर्ज की गई इस टिप्पणी से शिंदे गुट की चिंता बढ़ गई है।
हम चुनाव आयोग की कुर्सी पर नहीं बैठे हैं। कौल ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग के पास प्रतिनिधि-पक्षीय लोकतंत्र के क्षेत्र में व्यापक अधिकार और विशेषज्ञता है। आरक्षित चुनाव चिह्न का आवंटन किस तरह किया जाए, यह चुनाव आयोग को ही तय करना चाहिए, जिस पर न्यायालय ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि हम न्यायिक समीक्षा का काम कर रहे हैं। हम चुनाव आयोग की कुर्सी पर नहीं बैठे हैं। उपलब्ध विकल्पों पर उचित कानूनी आधार के अनुसार विचार किया गया था या नहीं, इसकी जांच हमें करनी है।
आज फिर होगी सुनवाई
शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने केंद्रीय चुनाव आयोग के पैâसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है, जबकि शिवसेना के मुख्य सचेतक और विधायक सुनील प्रभु ने विधानसभा अध्यक्ष के पैâसले को चुनौती दी है। इन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई चल रही है। न्यायालय गुरुवार को शिंदे गुट के शेष तर्क सुनेगा।

‘विधानमंडल में बहुमत से राजनीतिक पार्टी के स्वामित्व का निर्णय लेने के लिए एक प्रासंगिक मापदंड है। लेकिन जिन विधायकों की अयोग्यता की कार्यवाही लंबित है, उनका विधानमंडल में बहुमत उस पार्टी के स्वामित्व का निर्धारण करने के लिए निर्णायक या सुरक्षित मापदंड वैâसे हो सकता है?’
–सुप्रीम कोर्ट

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