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`दागियों’ को सेफ एग्जिट या कानूनी डंडा?..पीएम मोदी के बालसखा को १५ साल बाद वापस मिली जमीन!

-सिर्फ जमीन लौटाने और निर्माणकार्य अनुमति सरेंडर कर देने से क्या अपराध खत्म होगा?

सुरेश गोलानी / मुंबई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद उनके साथ स्कूल में पढ़ाई करने वाले सहपाठी और बालसखा ८१ वर्षीय असगर अली वोरा को १५ सालों बाद आखिरकार भू-माफियाओं के कब्जे से मीरा रोड स्थित अपनी जमीन तो वापस मिल गई है। लेकिन करोड़ों की जमीन हड़पने की कोशिश करने वाले रसूखदार नेता और बिल्डर पर कोई दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई होगी या नहीं, इस पर सस्पेंस पूरी तरह बरकरार है। अपनी जमीन पर अवैध कब्जे से परेशान होकर असगर अली वोरा ने ८ सितंबर को दिल्ली में पीएम मोदी से मुलाकात कर भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता के स्वामित्व वाली सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी पर अवैध कब्जे का आरोप लगाते हुए इस मामले में दखल देने और सीबीआई जांच की गुहार लगाई थी।
पीड़ित बुजुर्ग का आरोप था कि मामले में २०१५ में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद सीआईडी की रिपोर्ट आने में ११ साल का लंबा वक्त लग गया। इस प्रशासनिक देरी के पीछे मनपा और राजस्व विभाग के भीतर बैठी `अदृश्य शक्तियों’ का हाथ बताया जा रहा है। हद तो तब हो गई जब अपनी जमीन की लड़ाई लड़ रहे बुजुर्ग के खिलाफ ही कंपनी द्वारा आपराधिक मामला दर्ज कर दिया गया। हाल ही में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में प्रशासन ने केवल मेहता की कंपनी को जमीन का कब्जा छोड़ने और दोनों पक्षों के बीच `समझौते’ के नाम पर मामले को रफा-दफा करने के आरोप लग रहे हैं।
गौरतलब है कि इस प्रशासनिक सुनवाई से ठीक पहले ही मेहता के सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के संचालक ने पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर कहा है कि दोनों पक्षों के बीच `सौहार्दपूर्ण समझौता’ हो गया है और वे असगर अली वोहरा के खिलाफ अपनी पुरानी शिकायतें वापस ले रहे हैं। इसके अलावा कंपनी ने मनपा के नगर रचना विभाग के पास इस जमीन पर अपनी निर्माणकार्य अनुमति आधिकारिक रूप से सरेंडर कर दी है।
मुख्यमंत्री की भूमिका पर उठे सवाल!
पिछले १५ सालों से प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रहे पीड़ित बुजुर्ग का आरोप है कि मामले में २०१५ में जालसाजी की एफआईआर दर्ज होने के बावजूद सीआईडी की रिपोर्ट आने में ११ साल का लंबा वक्त लग गया। इस प्रशासनिक देरी के पीछे मनपा और राजस्व विभाग के भीतर बैठी `अदृश्य शक्तियों’ का हाथ बताया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बेहद करीबी माने जाने वाले नरेंद्र मेहता के अवैध कार्यों को लंबे समय तक प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा है। इसी क्रम में पिछले कई सालों से वोरा की शिकायतों को नजरअंदाज कर कंपनी को शह दिया जा रहा था।

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